Wednesday, September 10, 2014

ब्रह्म सत्य - जगत मिथ्या

ब्रह्म सत्य - जगत मिथ्या
कह गए आदि-गुरु शंकराचार्य
मैंने भी जीवन में अनुभव किया
जैसा कह गए हैं आचार्य


आज की गतिविधि देखकर
याद आ गए उपरोक्त विचार
हा-हा-हा-हा हँसी आ गई
जब देखा तेरा विचित्र व्यव्हार

कोई गिला नहीं-शिकवा नहीं
तू भी मजा ले रहे-मैं भी ले रहा
तू खेला रही-मैं खेल रहा
हा-हा-तू हँसा रही-मैं हंस रहा

यही तो जीवन है-यही कहानी है
ज़िन्दगी की यही रवानी है
कौन क्या लेकर आया है
कौन क्या लेकर जाता है

सब माया है-प्रभु की छाया है
यह संसार तिनका सा पड़ा है
जैसे भी हो-संसार चलना है
हमे भी जीना है-तुम्हें भी जीना है

अगर मुझे "सत्य-ज्ञान" न रहता
तो क्या तेरे माया-रूप में न भटकता
मैं भी पागल सा तिल-तिल मरता
और तू हा-हा औरो के साथ हँसता

पहले भी कहा था-हमेशा ही कहूँगा
साथ नहीं जिए तो क्या होगा
साथ जी ही लेंगे तो क्या होगा
जब कुछ नहीं होगा-क्यों न जियेगा

तभी तो-देख के तेरा किताब की उक्ति
ही दिल किया था कि आवाज़ दूँ
तू ना सुने-अनसुनी किये,तेरे दिल में था
मुझे हरा दूँ-मेरे दिल में था-तुझे जीता दूँ

हा-हा हँसी आ रही है मुझे
लिखते मैं - मुस्कुरा रहा हूँ :)
तुम कैसे हँसे होगे मेरे आवाज़ पे
मुझे पता है - मैं जान रहा हूँ :)

मैं बोलता जब-एक एक शब्द का भान है
नींद में भी रहूँगा - तब भी मुझे ज्ञान है
सपने की दुनिया में खो जाता हूँ
वह ईश्वर कहता-खो जा-"तू" मेरी जान है

तुम नहीं समझोगे-मैं परे हूँ इस दुनिया से
कितना भी विकाश कर लेगा ये दुनिया
पर यह कोई नहीं समझेगा-तुम भी नहीं
कि यह सब खेल है ईश्वर का- है एक माया

इसी खेल को खेलता देख
मैं भी इस दुनिया में खेल लेता हूँ
तुम हँसते हो मेरे ऊपर
मैं ईश्वर को देख हंस लेता हूँ

कोई गिला नहीं-शिकवा नहीं
तू भी मजा ले रहे-मैं भी ले रहा हूँ
तुम अध्भुत हो-कहता था-कहता रहूँगा
हा-हा तुम हँसा रहे - मैं हंस रहा हूँ           :)




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