Monday, September 1, 2014

रात भर बारिस बरसी

रात भर बारिस बरसी 
साथ में अँखियाँ भी बरसी 
तुझसे मिलने को तरसी 
ना जाने क्यों बारिस बरसी 

तुम जो ढूंढते हो 
"प्रेम" को "कामों" के बीच 
अगर "प्रेम" "काम" ही होता 
तो तुझे कब का छू लिया होता 
रात भर  ....

प्रेम तो वो अल्फ़ाज़ है 
जो बयाँ होने से पहले 
अँखियाँ समझ लेती 
झपक के मुस्कुरा देती 
रात भर  ....

किसी तरह जब नींद आ जाती थी 
सपने में तुम आकर बहकाती थी 
कहती थी उठ के बारिस के मजे लो 
मैं कहता था तू नहीं तो क्यों ले 
रात भर  ....

सपने में ही अब गीत बन जाती है 
सुबह उठकर मन में गुनगुनाती है 
अब बस भी करो तरसाने का आलम 
मेरी अँखियाँ बहुत बरसती है 
रात भर  ....

अब बदल भी लो ये तस्वीर  
अपने नए अल्फ़ाज़ों के साथ 
नई कविता मन में बहुत आती है 
अनदेखे साये में गुनगुनाती है 
जो बारिस में सबनम सी बरसती है 
तेरे बालों से खेलने को बढ़ती है 
तेरे पलकों के बूंदों में खो जाती है 
ये बाहें आलिंगन को तरसती है 
रात भर  ....

अब तो तय कर लो कोई एक पन्ना 
चेहरे किताब के बड़े आँगन में 
मिटा भी दो- चिढ जो हमसे है तुम्हे 
गालों पे  डिंपल करती मुस्कराहट में 

रात भर बारिस बरसी 
साथ में अँखियाँ भी बरसी 
तुझसे मिलने को तरसी 
ना जाने क्यों बारिस बरसी 


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