Friday, September 26, 2014

अनुभव के कुछ पल

तुमसे दुरी तो बस एक परदे की है 
अब इसे तुम मिलों दूर करो तो ये तुम्हारी बातें हैं 

जोर नहीं दे सकता क्योंकि ज्ञान से बंधा हूँ 
वरना तुमसे दुरी तो बस आइना के प्रतिबिंब सा है 

जब भी सांस लेता हूँ - हर सांस में तुम होते 
अब तुम कहो तो सांस से भी कोई दुरी रखता है क्या 

मैं नहीं बनता स्वार्थी अपने लिए 
मगर तुमको देखते ही स्वार्थ जग जाता है 

यह कोई ज़रूरी नहीं कि मुझे अबतक कोई मिला नहीं 
या जो है उसमे संतोष नहीं, तुम रहोगे तो तेरा भी संतोष है 

तुम भुलाने की चीज़ नहीं - क्योंकि तुम चीज़ नहीं हो 
तुम तो हो अनूठे रूह - जो बस रूह-से-रूबरू दिला देते हो 

तुम दुःख मानते मेरे विचारों का - क्या ये प्रेम सा तुम्हें नहीं दीखता 
कौन किसका ध्यान देता इस जग में - केवल प्रेम ही प्रेमी को दीखता 

तुम होते हो तो मेरा जीवन तुकांत बन जाता है
अब अगर मेरे बिना भी तुम तुकांत रहते तो अलग की बात है 

उम्र न मेरी ज्यादा है न तेरी कम है - 
रूह की कोई उम्र नहीं होती 
एक-बार बस एक-बार रूह को महसूस लेते - 
तो एक रूह की बात सच्ची लगती 

जब कायनात बनने लगे थे - 
तब एक-एक रूह उस "एक रूह" से निकलने लगी थी
तब रूहों ने पूछा फिर मिलूंगा कैसे - 
तो उसने कहा था - जब दो रूह मिलेंगे अपने से 

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