Tuesday, September 9, 2014

चल तुझे एक ग़ज़ल सुनाते हैं

चल तुझे एक ग़ज़ल सुनाते हैं 
तुझे चाँद के पार ले जाते हैं 
सपनों से हकीकत में लाते हैं 
तुझे गुदगुदी लगाते हैं 
हँसाते हैं, खिलखिलाते हैं,
लजाते हैं, शरमाते हैं 
तितलियों सी उड़ाते हैं 
चकमक रौशनी करते हैं 
पठाखा जलाते हैं 
नाच-भांगड़ा करते हैं 
दोस्तों को नचाते हैं 
हम-दोनों बैठ के ताली बजाते हैं 
मुस्कराते हैं 
अँखियाँ से अंखिया मिलाते हैं 
आँख-मिचौली नहीं करते हैं 
आमने-सामने खुलकर बात करते हैं.

मैं तो आ जाऊंगा सामने 
तेरे सामने 
अपने आईने के सामने 
अपने भाग्य के सामने 
अपने खुशियों के सामने 
अपने मृगनयनी के सामने.

पर किधर - पर कहाँ 
ये तो तुम ही बताओगे 
जगह तुम ही तय करोगे 
क्योंकि ये हक़ तुम्हारा है 
एक बार बोलने का 
एक बार दोस्ती के तरफ हाथ बढ़ाने का 
एक बार मेरे तरफ देखने का 
एक बार मुस्कुराने का
बार बार आँख मटकाने का .

दिल करता है - उड़ते हुए आऊँ
एक चांटा तुझे लगाऊँ
और पूछूं  कि मुझसे बात करते क्यों नहीं 
मुझसे लड़ाई करते क्यों नहीं 
और फिर तुझे चुटकुला सुना कर 
हसाउँ - खिलखिलाता चेहरा देखूं 
और खो जाऊं - खो जाऊं 
पर एक बार तो तुझे तो बोलना पड़ेगा.

कहीं मैं देखा 
कि राधा-कृष्णा के भाव को 
लोगों ने गलत समझा है 
लोगो को लगता है 
कि राधा-कृष्णा बिछुड़ने के बाद मिले ही नहीं 
पर हकीकत यह है 
राधा-कृष्णा आज भी मिलते हैं 
कभी विन्द्रावन में जाकर देखना 
कभी कुञ्ज गल्ली उनकी आवाज़ सुनना 
मैं तो सुन के आया हुँ
तभी तो तुमसे दूर हूँ 
पर फिर भी इतने पास हुँ 
जितना मैं अपने से हूँ .


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