Wednesday, October 28, 2015

In the honor of women

 In the honor of women.. I say this...

Seeing the woman
Find Full of creation
Lime light moderation
Or bristle magnification
All things we find
In human type of woman
Mix of all qualities
We find in human women

Always moving ahead
Present as nurturing human
Feed to all being a mother
Since ages these women

Women are powerful
Always keeps blessings
They are source of energy
A natural human beings

Come woman come women
Torch the human with a light
This earth needs full of care
Remove dark and spread light

Who said you are weak
They get vanished in a bleak
Spread your aroma essence
Lit an energy taking a break

O woman O women
You are full of power
Nourish the earthians
Enrich with kind shower

Sunday, October 25, 2015

क्यों दुनिया बदलना चाहते

क्यों दुनिया को बदलना हम सब चाहते हैं
कितनी अच्छी तो यह दुनिया चल रही है
कोई मोजों में मस्त कोई सागर में व्यस्त
हर एक की दुनिया सचमच में चल रही है

मत तौलों किसी के चलने की चाल को
हर एक की चाल सचमुच में  निराली है
दुःख से ना घबराओ,हो सके तो सवारों
हर बन्दे में परमात्मा की अनुपम छवि है

हम में से कोई बुरा नहीं बस थोड़ी सी अज्ञान है
जिस दिन अज्ञान छट जाता हम ज्ञानी हो जाते हैं
प्रेम प्यार से ही रहने को हम इस धरती पर आते हैं
एक पल या सौ पल खो जाएँ बस यही तो जिंदगी है

क्यों ना शिकवा करें हम अपनों से,सब तो अपने ही हैं
थोडा हंस ले थोडा गुनगुना ले बस यही जिंदगी है
राग द्वेष तो होता रहेगा अपनों से ही छलता रहेगा
इस छलने पे इतना क्या घबराना यही तो जिंदगी है

आकाश पाताल है सब सुना वहां भी अपनों को ढूंढते
जब यहाँ इतने सारे अपने भरे परे हैं फिर क्यों दुरी है
बस पहचान की देर है सवरों अपने सवारों औरों को
यही तो जिंदगी है यही तो खेल है उस खुदा का प्रेम है

क्यों दुनिया को बदलना हम सब चाहते हैं
कितनी अच्छी तो यह दुनिया चल रही है
कोई मोजों में मस्त कोई सागर में व्यस्त
हर एक की दुनिया सचमच में चल रही है 

Monday, October 19, 2015

दो पंक्तियाँ अनुपम सा

दो पंक्तियाँ अनुपम सा
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कितनी अच्छी भक्ति होती 
एक भक्त के लिए
कितना अच्छा प्रेम होता
एक प्रेमी के लिए
कितना अच्छा शब्द होता 
किसी गान के लिए
कितना अच्छा गान होता 
किसी संगीत के लिए
कितना अच्छा संगीत होता
उसमें खोने के लिए 
कितना अच्छा खोना होता 
उसे चाहने के लिए 
वह कितना अच्छा चाह होता
एक प्यासे की प्यास के लिए
कितना अच्छा प्यास होता
उस पानी के लिए 
कितना अच्छा पानी होता
उस चंचल बून्द के लिए
वह बून्द कितना अच्छा होता
टपकने से आवाज़ के लिए
उस आवाज़ की क्या सीमा होती
अनवरत चलते समय के लिए 
और अब समय है 
वो दो पंक्तियाँ जानने के लिए 

मेरी मज़दूरी का मुआवजा ना दो
लेकिन अपने से मुझे दुरी मत दो 

ये कितनी अच्छी भक्ति है
एक भक्त के लिए
ये कितना अच्छा प्रेम है 
एक प्रेमी के लिए
ये कितना अच्छा शब्द है 
किसी गान के लिए
ये कितना अच्छा गान है
किसी संगीत के लिए
ये कितना अच्छा संगीत है 
उसमें खोने के लिए 
ये कितना अच्छा खोना है 
उसे चाहने के लिए 
ये कितना अच्छा चाह है 
एक प्यासे की प्यास के लिए
ये कितना अच्छा प्यास है 
उस पानी के लिए 
ये कितना अच्छा पानी है 
उस चंचल बून्द के लिए
ये बून्द कितना अच्छा है
टपकने सी आवाज़ के लिए
उस आवाज़ की क्या सीमा है 
अनवरत चलते समय के लिए 
अब समय है 
ये दो पंक्तियाँ अपनाने के लिए 

कि मेरी मज़दूरी मत दो
लेकिन दुरी भी नहीं दो 

मेरी मज़दूरी का मुआवजा ना दो
लेकिन अपने से मुझे दुरी मत दो 

Thursday, October 15, 2015

गलती करता रहूँ तुझसे - एक ग़ज़ल

क्यों ऐसा लगता कि
गलती करता रहूँ तुझसे
हंसी ठिठोली करता रहूँ तुझसे

नाजों से मैं तुम्हें गुदगुदी लगाऊँ
हंसी ही हंसी में गलती कर जाऊँ
खाली पिली का गुस्सा दिलाऊँ
बातों ही बातों में तुझे मनाऊँ

ऐसा क्युँ लगता कि
गलती करता रहूँ तुझसे
हंसी ठिठोली करता रहूँ तुझसे

मान मत ज्ञानी मुझे
ज्ञान बखारना नहीं तुझसे
आँखों ही आँखों में
इशारा करता रहूँ तुझसे

ऐसा क्यों लगता कि
लाड लगाऊँ मैं तुझसे
मीत सा रीत निभाऊँ मैं तुझसे

करने दे गोरी मुझे तुझसे ही प्यार
यार यार कह के करने दे प्यार
नैनों की भाषा पढ़ पढ़ के तुझसे
खोता जाऊँ सागर में मिलता रहूँ तुझसे

ऐसा क्यों लगता कि
प्यार करता रहूँ तुझसे

बार बार गलती करता रहूँ तुझसे