Friday, December 26, 2014

सर्दी की तपिस

मेरे लिखने की कला को कला न समझो 
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए 
तेरे रेशमी जुल्फों को लहराते हुए भी ना देखा
कमबख्त सर्दी ने टोपी तुमसे पहनवा दी है 

तेरे नयनों के नूर से तपिस मुझ तक पहुंची 
क्या ये नूर, तुझे गर्मी नहीं दे पा रहे हैं 
तेरे चेहरे पे खिलती ये मुस्कराहट की लहर 
बार-बार मुझे तेरी ओर बरबस धकेल रही है 

मेरे लिखने की कला को कला न समझो
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए...

ये जो तेरी मुस्कराहट मुझसे कह रही है 
कि खो जाऊँ खिलखिलाहट में हमेशा के लिए  
बाँध लूँ तुझे अपने बंधन में हरवक्त के लिए 
साँसों से गर्म रखूं तुझे सर्द से बचने के लिए

मेरे लिखने की कला को कला न समझो
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए...

ये जो तेरी आँखों की चमक आती है मुझतक 
कहती है खो जाऊँ इनमे सदा-सदा के लिए 
पा तो लेता हूँ तुझे रोज सपनों में अपने लिए 
कब पाउँगा इन आँखों में डूबना हमेशा के लिए 

मेरे लिखने की कला को कला न समझो
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए...

बचा के रखना अपने को इस सर्दी से 
भले किसी की गर्मी उधार भी लेनी पड़े 
अगर अहम में किसी को ना दो मौका 
पर मुझे तो दो मौका हमेशा के लिए  

मेरे लिखने की कला को कला न समझो
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए...




अहम् - वहम्

तुम मुझे छूट दो 
मैं तुम्हें मुझसे छूटने नहीं दूंगा 
तुम मुझे छुटकारा दोगे
मैं जीवन से ही छुटकारा पा लूंगा

यह छूटना 
तुम्हें तो पच जायेगा
पर सचमुच 
मुझसे नहीं पचाया जाएगा 

तुम कहते 
मुझे अहम् भी है वहम् है

अहम् पर शेर बोलता हूँ- 
कब रहा मुझ में अहम्, ये तुम मुझे बता दो 
कितनी बार तेरे आँखों में झाँका,फिर भी कहते बता दो 

मांगता कुछ किसी से जब कोई समझता नहीं है 
तुम समझ के भी अनजान हो,फिर मांगू कैसे,ये बता दो 

वहम् पर  हकीकत बोलता हूँ - 
अगर मुझे वहम् होता, मैं सचमुच तुम्हें नहीं चाहता 
तुम तो पानी की तरह निश्छल हो, मैं कैसे तुम्हें नहीं चाहता

इतनी चाह है मुझे तेरे लिए, जितनी मुझे अपनी जिंदगी की नहीं
कैसे जी रहा हूँ मैं अपनी जिंदगी, सचमुच ये मुझे कुछ पता नहीं  

इस अहम् और वहम् से - "अ" और "व्" दोनों निकल गया है 
हम-दम बनने के लिए, दोनों शब्दों का  "हम" सिर्फ बच गया है  

Thursday, December 25, 2014

चलो अच्छा है

तुम्हें देखकर अच्छा लगा
चेहरे किताब पर
ऐसा लगा जैसे अब यह किताब है भरा-भरा
तुम छा गए किताब पर 
एक अलंकार की तरह
एक छंद की तरह 
आसमान में पतंग की तरह 
नदी में कमल की तरह 
समुद्र में तरंग की तरह 
रंग में लाल की तरह 
धूल में गुलाल की तरह 
चेहरे में आँख की तरह 
आँख में मृगनयनी की तरह
हम में तुम की तरह 
तुम में मैं की तरह 

चलो अच्छा है
तेरी ज़िन्दगी अब चलने लगी 
मौषम की तरह आने लगी 
गीत गुनगुनाने लगी 
फूल खिलने लगी 
बगिया चहकने लगी 
आँगन महकने लगी 
भौरें आने लगे 
और तू खिलखिलाने लगे.

चलो अच्छा है 
मेरे सिवा सब हैं तेरे साथ 
तुम्हें मेरी जरूरत नहीं
तुम्हें मेरी चाह नहीं 
जैसे पहले नहीं थी 
जैसे कभी नहीं थी.

चलो अच्छा है 
कुछ भी नहीं अच्छा है 
चलो अच्छा है तेरे लिए
कि मेरे लिए कुछ भी नहीं अच्छा है 
चलो अच्छा है 
चलो अच्छा है 

Sunday, December 21, 2014

कोई जब मुस्कुराता है

तेरा दुःख जानकार 
मैं दुखी हो गया 
तेरे दुःख के सामने 
मेरा दुःख भाग गया 

तेरे दुःख का निदान ढूंढा
मैं जोर-जोर हंसने लगा 
मैं अपने दुःख भूल जाऊं 
तेरा दुःख भी भागने लगा 

कोई जब मुस्कुराता है 
उसके पीछे कारण होता है 
वह कारण और कुछ नहीं 
संतोष का पराकाष्ठा होता है 

मैं ये पा लूँ, जब मन कहता है 
पूछ लेता हूँ अब अपने मन से
किसी को दुःख तो नहीं होता है 
किसी को मेरे इक्क्षा पाने से  

तब इक्क्षा पाना या ना पाना
यह प्रश्न दुःख  नहीं बनता है  
मन एकदम शांत हो जाता है
और  इक्क्षा ख़त्म हो जाता है  

फिर मैं मुस्कुराने लगता हूँ 
अपने दुःख पर हंसने लगता हूँ 
तेरे दुःख पर हंसने लगता हूँ 
पाने का विचार खोने लगता हूँ 

यह ज्ञान सचमुच आज ही आया
जब मैं अपने दुःख के कारण को 
तेरे दुःख से जोड़ा,तुझ से जोड़ा 
तेरे दुःख को निदान करने को 

तेरे दुःख का निदान ढूंढकर 
मैं जोर-जोर से हंसने लगा 
मेरा दुःख छोटा पड़ गया
दोनोँ का दुःख भागने लगा

जब कोई कुछ पाने को चाहता 
उसकी स्थिति नाजुक होती 
ऐसा कह सकते-उसकी स्थिति
कुएँ में रहने जैसे ही है होती

कैसे कोई कूआँ में रहकर 
पानी का उपयोग है कर सकता 
यही पानी कुएँ से बाहर रहकर
जब पानी लाता,बहुत स्वाद पाता

सच कहूँ, इक्क्षा की स्थिति भी 
कुएँ में रहने जैसे कुछ-कुछ होती
पाना चाहता अज्ञान में रहकर
सही में बड़ी दयनीय स्थिति होती 

तेरा दुःख जानकार 
मैं दुखी हो गया 
तेरे दुःख के सामने 
मेरा दुःख भाग गया 

तेरे दुःख का निदान ढूंढा
मैं जोर-जोर हंसने लगा 
मैं अपने दुःख भूल जाऊं 
तेरा दुःख भी भागने लगा 

मैं जोर-जोर से हंसने लगा 
बैठे-बैठे गुनगुनाने लगा 
तुझसे बातें करने लगा 
मन-ही-मन मुस्कुराने लगा 

Saturday, December 13, 2014

नज़रे तो मिलाओ मुझसे-क्यों नज़र झुकाये हुए हो

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो 

यूँ गुमसुम क्यों  हो  बैठे
दिल में आया पूछूं  हाल
नज़रें झुकाये क्या सोच रहे 
सच में हुआ मेरा दिल बेहाल

लालू चुनरिआ पहन के तुम  
यूँ क्यों शर्माए हुए हो
तेरी भोली सूरत बोले 
कुछ -कुछ घबराये हुए हो 

कितने बिंदास लगते थे तुम 
ठीक इससे पहले की तस्वीर में 
लगता था कुछ कर बैठोगे 
अपनी फोटो खिंचवाने में

फिर अचानक क्या हुआ तुझे 
अभी की ताज़ी-ताज़ी तस्वीर में
क्यों गुमसुम- गुमसुम बैठो हो 
गज़ब लगते- इस गदराये भेष में

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो

अब चुप हो गया हूँ मैं 
छुपकर तुमसे दूर होकर
जैसे कोशिश है छुपने की 
तुम अपने  भेष बदलकर

नहीं झेल सका दुरी तुमसे
दर्द से हो जाता था बेहाल
आशा करता कि तुम पूछोगे 
कैसा है मेरे दुश्मन का हाल   ;)

फिर भी तेरी सुगबुगाहट  नहीं 
ना ही खुली तेरी बंद खिड़की  
मैं ही सोचा दूर हो जाऊं
मौत दिखाने लगा था तिड़की

बस यही तो है मेरा हाल 
ना कोई दिशा,ना कोई चाल
इसमें तुम कुछ ऐसे दिखे  
कि दिल हुआ पूछूं क्या है हाल

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो

तुम्हे देखते ही हो जाता
सुरम्य सा मेरा सुना संसार 
अार-पार कुछ नज़र नहीं आता 
जुड़ जाता तुझसे तार

अब तो कम से कम तार जोड़ लो 
बेतार जगत के जुगाड़ जोड़ लो 
कुछ सुन लो, कुछ सुना लो 
अपनी मुस्कराहट में हंस लो

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो


जिंदगी के अंदाज़ ...

जिंदगी के अंदाज़ ...

वाह रे जिंदगी 
ना भरोसा रहते हुए भी,
पल-पल तो छोडो,
कितने पल गुजार लेते,
उम्र-दर-उम्र गुज़ार लेते
साल-दर-साल गुजार लेते :)

और उनके नखरे देखकर 
मौत को भी भगा देते
मुस्कान चेहरे पे ला देते
उनके इंतज़ार में,पल-पल जीला देते ;) 

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अर्ज़  किया  है..

समंदर को तो पता भी नहीं चलेगा 
कि कोई पत्थर फेका भी गया है 
हाँ, अगर मन-समंदर की बात है 
तो समझ में भी आती है 
पत्थर तो इसलिए फेका जाता है 
कि देखें कितने गहरे तक जाती है ;)
यही तो इश्क़ है,
कि पत्थर को पत्थर ना समझो 
उसे एक पैगाम समझो
कितनी गहराई तक गई 
यह पता लग जाती है 
और दिल-से-दिल की बात हो जाती है :) 
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कैसी प्यारी नींद है..

कितनी अनूठी नींद होती है
कितनी भोली नींद होती है 
बच्चों की नींद हो या बड़ों की
नींद सबकी - बच्चों सी होती है

प्यारी नींद, दुलारी नींद 
नींद में डूबी  सबकी नींद
शक्ति लाती फुर्ती लाती 

आपकी नींद सबकी नींद :)   
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Tuesday, December 9, 2014

लाल चुनरिया - एक प्रयास - भोजपुरी भाषा में

लाल चुनरिया - एक प्रयास- भोजपुरी भाषा में     
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लाल लाल होठवा पे
लाली रे चुनरिया 
गोरी -  सुघड़ लागे रे 
होsss - सुघड़ लागे रे 

गाल के डिंपल सिंपल नइखे 
मुखड़ा तोहार लाजवाब 
कौने हाल में बैठल बारू
गोरी - तोहार नहीं जवाब  

तन के जे बइठल बारु
फोटवा खिंचाई के
होsss  - सुन्दर लागे रे 
होsss - सुघड़ लागे रे 

पढ़ल-लिखल लागे तारु 
गोरी तू हो कमाल
खड़ा होके तू जे ठुमका लगइबू 
महफ़िल हो जाय मालामाल 

लाल लाल होठवा पे
लाली रे चुनरिया 
गोरी -  सुन्दर लागे रे 
होsss - सुघड़ लागे रे 

आ जाऊं - चल आ जाती हूँ

तुम्हे कब से बोल रहा हूँ
अंखियाँ मे झांक कर कह रहा हूँ
कि  मत दिमाग लगा हमारे प्यार मे
दिल से बात कर ले- दिल से कह रहा हूँ

जब तुम छुपकर
नकली बनकर
बहरूपिए भेष मे
हूमसे पुच्च्ती हो
कि आ जाऊं 
सचमुच आ जाऊं 
चल आ जाती हूँ

तब तेरी एक तस्वीर की मुद्रा
याद आ जाती है
जिसमे तुमने
आंखो मे झाँकते हुये
खिंचवाया है
जिसमे तुमने
अपने हसीन चहरे को
हाथ पे टिकाया है 
बाल खुले है
दिल के विचार
तेरे चमकते आंखो से
गुलाबी गालो से
हल्की डिंपल से
मुस्कुराते चेहरे से
ब्यान करती है
कि  आ जाऊं 
सचमुच आ जाऊं 
चल आ जाती हूँ

ये कौन  सी तारीख की तस्वीर है
क्या तुझे याद है
कि तुम उस दिन से
बोल रहे हो
कि आ जाऊं  
सचमुच आ जाऊं 
चल आ जाती हूँ
पर हकीकत  मे जब
मैं बात करना चाहता
तुझे सुनना चाहता
तो तुम ऐसे कतरा जाते
जैसे कभी पहचान ही ना हो
और मैं  बस
सोचता रह जाता
कि ये सपना है
या हक़ीक़त है
कि आ जाऊं 
सचमुच आ जाऊं 
चल आ जाती हूँ .

दूरी तो बस एक पर्दे की है
अब तुम इसे मीलों दूर कर रहे हो
तो ये तेरी बात है

"अर्रे आना, सचमुच मे आना
ये तो बहुत नसीब की बाते होंगे
कमसेकम अभी के पल तो जी ले दोस्ती के
आयेज की बाते हुंमिल के फैसला करेंगे"

खुशियाँ

कहने को तो कह दिया मैने
मनुष्य को खुशियों की राह 
खुद बनानी पार्टी है
जीने के लिये

पर वो खुशियाँ है क्या
कितने तरह की होती है
कैसे चुनी जाती है
कैसे लाइ जाती है
क्या क्या चाह होती है
सब तुझसे जुड़ गई है
और तेरे बिन
कोई भी ख़ुशी नहीं दिखती

जब भी कोई खुशी उड़ती आ जाती
तो यही देखता
तुम होते तो कैसे चहकते
तुम होते तो कैसे मुस्कुराते
तुम होते तो कैसे खिलखिलाते
तुम होते तो कैसे चमकते

और वो खुशी 
बिन भींगाए ही मुझे
समुद्र की लहर की तरह
उठकर शांत हो जाती

मेरे इन विचारों से
ऐसा नहीं समझना
कि मैं दुखी हूँ
बस खुशियों को 
पहचानने की समझ आ गई
यही समझ  काफी है
उस खुशी मे डूबना
डूबकर इतराना नहीं कर पाता
डूब ही जाऊं
इन खुशियों मे 
इसकी ज़रूरत नहीं महसूसता
बस मुस्कुराता
और तेरी मुस्कुराहट मे खो जाता.

Thursday, November 27, 2014

कितना सकून मिलता है - एक ग़ज़ल

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर 
उतना सकून तुम्हे भी नहीं मिला होगा 
मुझसे दूर होकर 

बहुत दर्द हुआ था 
जब बोले - चले जाओ जिंदगी से
बहुत लड़ा था अंपने से, तुमसे, सबसे 
जिंदगी से, न जाने किस-किस से 

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर ....

जब से चाहत तेरी खत्म हुई
ख़त्म होगी सारी कहानी 
थोड़ी सी जिंदगी, थोड़ी रवानी 
कट गई तेरी मेरी कहानी 

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर ....

छुपना केवल मुझसे  तेरा 
अब होगी नहीं तुझे ज़रूरत 
लो जी लो तुम अपने जिद पर 
छुपा लिया मैं - अपनी सूरत 

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर ....

दर्द क्या है, पता नहीं 
दवा की भी कोई दुआ नहीं 
तड़पना क्या है-तड़पन क्या है 
इसकी किसी को हवा नहीं 

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर ....

ये कौन जाने, कैसे जाने 
कितना दर्द होता-तुमसे दूर होकर
ना तुम समझोगे,ना तेरी दुनिया 
कितना सकून मिलता-तुमसे प्यार होकर

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर 
कितना सकून मिलता है 
तुमसे प्यार होकर 



Wednesday, November 26, 2014

प्यार के छंद

प्यार करना तूने "अपने को खोना" समझा 
प्यार करना हमने "अपने को पाना" समझा 

"प्यार" कोई भीख नहीं कि माँगा जाय और दिया जाय 
"प्यार" तो अनमोल है,बस किया जाय और लिया जाय 

ना देनेवाले को पता चलता कि हमने प्यार दिया 
ना लेनेवाले को भान होता कि हमने प्यार लिया 

चमड़े के व्यापारी क्या करेंगे प्यार 
रूह से जबतक रूबरू ना हो, क्या करते प्यार  ?

Friday, November 21, 2014

चंद छंद

अर्ज़ है :-
जबतक जिंदगी को "कोई" पढ़ ना ले 
जिंदगी शांत नहीं महसूस करता 
जबतक "मैं" शांत नहीं रहता 
"जिंदगी" अशांत सा भटकता रहता  

अर्ज़ है :-
क्यों कोहराम मच जाता है प्यार कर लेने पर 
क्यों औरों का दिल जल जाता है प्यार कर लेने पर 

अर्ज़ है :-
कौन सी जीत, कौन सी हार 
तय तो हो पहले कौन हैं पहनानेवाला हार
अगर जीत कर भी तुम ना मिले 
तो क्या करेगा लेकर वो हार !

अर्ज़ है :-
सामने रहकर तो इतनी अनसुनी करते 
फिर पीछे कौन आँकेगा मेरी "जीत या हार"

अर्ज़ है :-
लिख भी लेते तो क्या होता 
उन्हें पढ़ना जो नहीं था मेरा किताब
अनपढ़ कौन पढ़े-लिखे होते हैं 
फिर भी कर लेते ख़ूबसूरती से हिसाब 

आस में जिंदगी बीत गई

ज़िन्दगी जीते-जीते जिंदगी बीत गई 
मौत के साये में जिंदगी बीत गई 
बंदगी के आस में जिंदगी बीत गई 
मौत भी नहीं मिली पर जिंदगी बीत गई 

तुम्हे शौख था-हमसे दूर जाने का 
बहाना ढूंढते थे - हमसे दूर जाने का 
अपने शौख को तूने तो जी लिया 
पर हम इंतज़ार ही करते रहे दूर जाने का 

आज भी सोचता हूँ सोने से पहले 
ऐसा क्या मांग लिया था मैंने तुझसे 
कभी नहीं सोचता सुबह उठूंगा ही 
मगर हर सुबह सोचता-कैसे मिलूँ तुझसे 

धूमकेतु की तरह क्यों घूमता रहता हूँ 
तेरे यादों में क्यों खोया रहता हूँ 
दूर तनहा बैठकर भी क्यों खोया रहता हूँ 
चाहत की वृक्ष को क्यों रोज सींचता हूँ 

दर्द क्या होता अब यह भी पता नहीं 
दुनिया से दूर हूँ यह भी पता नहीं 
दुनिया में अपने कौन हैं - पता नहीं
पर क्यों ढूंढता तुझे ये आँखे - पता नहीं 

इज़हार का मेरा ठिकाना तो निश्चित है 
ये साबित करता-मुझे तुमसे प्यार है 
मेरा इज़हार तुम पढ़ते हो-सोचते हो 
सुनते हो-फिर गुमनाम सा फेक देते हो 

तेरा कोई ठिकाना नहीं-रखना भी नहीं चाहते 
ये साबित कर दिए कि मुझसे कोई चाहत नहीं
ये परोक्ष होकर मनवा ही दिए मुझसे कि 
मेरे लिए कोई प्यार नहीं-कोई इकरार नहीं 

ज़िन्दगी जीते-जीते जिंदगी बीत गई 
मौत के साये में जिंदगी बीत गई 
मिलन की आस में जिंदगी बीत गई 
मौत भी नहीं मिली पर जिंदगी बीत गई 

Tuesday, November 18, 2014

खो जाऊंगा-उड़ जाऊंगा

मैं खो जाऊंगा 
मैं चला जाऊंगा 
दुनिया के उजाले से 
मैं उड़ जाऊंगा 

कौन मैं - कैसा मैं - किसका मैं 
मेरा मैं या तेरा मैं या हमदोनो का मैं 
न मेरा मैं - न तेरा मैं - न हमदोनो का मैं 
मैं तो बस मैं होता- न तेरा होता न मेरा- ये मैं 

मैं उड़ जाऊंगा 
मैं चला जाऊंगा 
रात के अँधेरे में  
मैं खो जाऊंगा 

कर्मजाल हैं फैले-फैले 
विस्तृत है माया जाल 
जीते-मरते रस्ते में 
रह जाते यह तन-कंकाल 

मैं खो जाऊंगा 
मैं चला जाऊंगा 
दुनिया के रस्ते से 
मैं उड़ जाऊंगा 

जीवन-जीवन करते करते 
यह तन हो जाता बेहाल 
का-से-कहूँ मनवा की बात 
सब-हैं-अपने में ही बेहाल 

मैं खो जाऊंगा 
मैं चला जाऊंगा 
मन के मायाजाल से 
मैं उड़ जाऊंगा 

कहत कबीर सुनो भाई साधु 
कोई किसी का ना है बंधू 
सब हैं चलते अपने अपने रस्ते
सफल वही है जो हैं अपने का बंधू 

मैं खो जाऊंगा 
मैं चला जाऊंगा 
बंधू के भुलावे से 
मैं उड़ जाऊंगा 

Monday, November 17, 2014

बहुत दिन बाद हँसाने को दिल करता है

तुझे मनाने को दिल करता है 
तुझसे मिलने को दिल करता है 
तुझे हँसाने को दिल करता है 
तुझे चिढ़ाने को दिल करता है 

तस्वीर में जो देखा तुझे सुहागन के साथ 
दिल में हुआ कि पूछूँ क्या है तेरा  विचार ;) 
क्या तुझे भी दिल हो रहा है सुहागन बनने का 
आओ मिलकर करते हैं हम दोनों ये शुभ विचार   ;) 

यह सोचते ही दिल मेरा बाग़-बाग़ खिल गया 
दूर से ही तुझे गुदगुदी करने को हो गया 
यह सोच के कि कैसे तुम खिलखिला रहे होगे 
तन-बदन में रोम-रोम उठ कर खड़ा हो गया 

तुझे चिढ़ाने को दिल करता है 
तुझे हँसाने को दिल करता है 
तुझे मनाने को दिल करता है 
तेरे साथ हँसने को दिल करता है 

तेरी भूख-प्यास देख के दिल मेरा पिघल गया
पूछूँ क्या है तेरा हाल दिल मेरा मचल गया
जब मैंने दी आवाज़- तू बात करने से मुकर गया 
तेरी प्यास और मेरा दर्द कहीं अनंत में खो गया  

क्या कहूँ - देख कर ये तेरी बेरुखी 
दिल करता है कि पूछूँ क्यों सुनते नहीं 
शायद तूने अबतक यह हक़ नहीं दिया 
इसलिए तो तुम मुझसे बात करते नहीं 

आज तुझे मनाने को दिल करता है 
कबसे तुझे हँसाने को दिल करता है 
आज तुझे मनाने को दिल करता है 
साथ-साथ हँसने को दिल करता है 

फिर देखा तेरा शौख़-पीछा करने को हुआ 
किसपे गिरा गाज़ तुझसे पूछने को हुआ 
मुस्कराहट से भरी सन्देश का अंदाज़ तेरा 
दिल मेरा भी खिल कर बाग़-बाग़ हुआ 

दिन बीतते जा रहे हैं किस इंतज़ार में 
रोज ख्वाब सजते जा रहे है इंतज़ार में 
मयस्सर नहीं अबतक एक बून्द का भी 
फिर भी खड़े है हम बारिस के इंतज़ार में 

तुझे मनाने को दिल करता है 
तुझसे मिलने को दिल करता है 
तुझे हँसाने को दिल करता है 
तुझे चिढ़ाने को दिल करता है 

अभी देखता हूँ तुझे चश्मा लगाये 
दिल घबराये और नयना चुराए 
सुंदरता का बखान करके तू लजाये 
ऐसी क्या बात हुई कोई तो बताये 

ये रूप तेरा देखकर मन है मुस्कुराया 
पूछने को तुझसे मेरा दिल है किया 
पर पूछने का यंत्र ही खराब हो गया 
क्या कहूँ गोरी मैं, दुनिया से कट गया 

अब कैसे करुँ बात, बहुत दिल करता है 
तुझसे मिलने को बार-बार दिल करता है 
तुझे मनाने को हर-बार दिल करता है 
साथ-साथ हँसने-हँसाने को दिल करता है 

तुझे मनाने को दिल करता है 
तुझसे मिलने को दिल करता है 
तुझे हँसाने को दिल करता है 
तेरे साथ हँसने को दिल करता है



Thursday, November 13, 2014

नींद - मौत - तप

अज्ञान से देखने पर 
""नींद आधी मौत" जैसा दीखता है 
और 
"मौत मुकम्मल नींद" जैसा दीखता है 

पर ज्ञान की दृष्टि में 
"नींद में आत्मा शरीर में रहते हुए अपने को तोरोताजा करता है"
और 
"मौत में आत्मा शरीर से मुक्त होता है जो कि आत्मा का मूल रूप है"

इससे आगे एक और अवस्था है 
"तप - जिसे मनुष्य जीवन में रहते कर सकता है"

विशेषार्थ - 

"आत्मा तप करने से शक्ति प्राप्त करता है 
यह शक्ति वह केवल मूल रूप में ही कर सकता था
लेकिन जीवन में रहते हुए तप करके शक्ति प्राप्त कर सकता है"

Monday, November 10, 2014

नींद से उठता ही क्यों हूँ

ओ मृगनैनी-मनमोहिनी !
नींद से उठकर 
देखता हूँ तुम पास नहीं हो 
सोचता हूँ मैं उठा ही क्यों 
ये हुस्न-बे-परवाह !
नींद से पहले भी तुम न होते 
नींद से उठने बाद भी ना होते
सोचता हूँ मैं उठता ही हूँ क्यों 

तुझे भी शायद मेरी जरूरत नहीं 
तुम शुरू से ही दूर थे 
नज़दीकियां इतनी ही रखते थे 
कि दुरी होने पे भी दुरी बनी रहे 
वरना इतने जोड़-तोड़ के बाद भी 
तुझे इक्छा नहीं हुई मिलने की.

सोचता हूँ इतने दिन बाद भी 
मैं नहीं भूल पाया तुम्हें
या तुमने नहीं भूलने दिया 
या तेरी तस्वीर ने दूर नहीं जाने दिया 
तुझसे अच्छा तो तेरी तस्वीर है 
जिससे घंटों में बात कर लेता 

देखता तुम नहीं हो हकीकत में 
चलो-सपने में तुझे पकड़ता हूँ 
वहाँ तुमसे मुलाकात भी होती 
बात भी होती - रात भी कटती 
और जब नींद से उठकर 
देखता हूँ तुम पास नहीं हो 
सोचता हूँ मैं उठा ही क्यों
सोचता हूँ मैं उठता ही हूँ क्यों 



Saturday, November 8, 2014

भरा जो तूने दूर से आलिंगन

भरा जो तूने दूर से आलिंगन  
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लगता है तूने दिल से दिया था मेरे को आलिंगन 
दिल गद-गद महसूस रहा है भर के वो आलिंगन 
कैसा तुम महसूस रहे हो भर के मेरा आलिंगन 
क्या तुम भी गद-गद महसूस रहे - मेरा आलिंगन 

अहम तेरा तुझे अपने पे - मुझे बहुत अच्छा लगता
याद आता कैसे तुम विचरण करते थे-अच्छा लगता 
बड़े-बड़े विषयों पे-बड़ी बड़ी बाते करते-अच्छा लगता 
बड़े-बड़े-लोगो से-बड़ी-बड़ी मुलाकातें-अच्छा लगता 

हर कामों में व्यस्त तुम रहते थे-पर लगता मैं था 
हँसते-खिलखिलाते तुम रहते थे-पर लगता मैं था 
सदा अच्छे-अच्छे बात करते - पर लगता मैं था 
हरदम ख़ुशी से दमकते रहते थे -पर लगता मैं था 

देखते-देखते वर्ष बीते-लगता जैसे बिछुड़े कल तुम हो 
रोज सपनों में आते-भूलने नहीं देते-जैसे पास तुम हो 
इकीसवीं सदी में भी सपनों की बात करता-ऐसे तुम हो 
नहीं दे सकता था कोई तकलीफ तुझे-जैसे अपने तुम हो 

क्या कहूँ तुझसे-कैसे कहूँ तुझसे-हरवक़्त तुम ही तुम रहते 
मेरे दिल की भाषा समझ कर भी- तुम हरवक़्त  चुप रहते 
बात करने को तुझे इक्छा नहीं होती क्योंकि तुम छुपे रहते 
छुप-छुप बात करके तुम-अपने हँसते रहते-मुझे  तड़पाते रहते 

भरा जो तूने आज आलिंगन-दिल मेरा सचमुच गद-गद हुआ 
क्या तुम्हें भी महसूस हुआ-दिल तेरा सही में गद-गद हुआ 
राधा-कृष्णा भाव यही है-सचमुच हरवक्त मुझे याद हुआ 
काया-माया-तृष्णा क्या है-सचमुच तेरी मूर्त जाग्रत हुआ 

तुम कोई मंज़िल नहीं-तुम तो हो राही-हमसफ़र प्यार के 
एक बार जो तुम बोल देते - बोल भी लेता - बोली प्यार के
जिद तेरा भी मुझे अच्छा लगता-मुस्कुराता हुआ प्यार के  
नदी की तरह-बिन कहे-मिल जाएँ- निभाएं बंधन प्यार के

Friday, November 7, 2014

नहीं चाहिए तेरा सॉरी-क्या करोगे लेकर मेरा सॉरी

नहीं चाहिए मुझे तेरा सॉरी 
क्या करोगे लेकर मेरा सॉरी 
ऐसे घुल मिल जाओ जीवन में 
ना महसूस करो किसी का सॉरी 

तुम लगते हो इतने अपने
कि नहीं करता दिल लेने को तेरा सॉरी 
कि नहीं करता दिल तुझसे कहने को सॉरी 
मन के मीत लगते- फिर करे कोई क्यों सॉरी 

नहीं चाहिए मुझे तेरा सॉरी 
क्या करोगे लेकर मेरा सॉरी ...

नदी की धारा बनकर जीते जाओ 
औरो को जीवन देते जाओ 
तुम मुझे दो जीवन - मैं तुम्हे दूँ जीवन 
दिल से कहो - बिना कहे कुछ भी सॉरी 

नहीं चाहिए मुझे तेरा सॉरी 
क्या करोगे लेकर मेरा सॉरी ...

फिर भी अगर तुम्हे चाहिए सॉरी 
ले ले मुझसे मेरी सॉरी 
कर ले अब तू जोड़ा-जोड़ी 
छोड़ के गुस्सा-निकाल के सॉरी 


नहीं चाहिए मुझे तेरा सॉरी 
क्या करोगे लेकर मेरा सॉरी ....

तुम क्या हो मेरे लिए- ये तुम नहीं जानते 
मैं क्या खोया हरदिन - ये तुम नहीं जानते 
हो-हो- नहीं चाहिए मुझे तेरा सॉरी 
हो-हो- नहीं देना मुझे तेरा सॉरी 

नहीं चाहिए मुझे तेरा सॉरी 
क्या करोगे लेकर मेरा सॉरी
ऐसे घुल मिल जाओ जीवन में 
ना महसूस करो किसी का सॉरी 






Wednesday, November 5, 2014

ना तुम्हे होश है, ना मुझे होश है

ना तुम्हे होश है, ना  मुझे होश है 
हम बहे जा रहे हैं, बेपनाह मोहब्बत में 
ना तुझे फ़िक्र है, ना मुझे फ़िक्र है 
हम चले जा रहे हैं अंधियारे से गली में 

दर्द इतना ही हो कि दर्द का मिशाल हो  
दर्द इतना भी ठीक नहीं कि एक मशाल हो 
तड़पते रहे हम युहीं तेरे अनंत इंतज़ार में 
पता नहीं क्यों सफर को लगता एक मुकाम हो 

मैं यह तोहमत लगाता कि तुम हो मजे में
तुम यह तोहमत लगाते कि मैं तो हूँ मजे में 
हम दोनों ने खरीद ली बेमोल की मोहब्बत 
वक़्त जाया होता बस समझने और समझाने में 

मेरा तो कुछ ठिकाना भी है, तू तो है नदी की तरह
जिधर चाहे तुम मुड़ जाते,मेरा तो है बस तू ही डगर 
प्यार के अहसास की जगह तेरा अहसान सा दीखता 
पहले तू अपना बना ठिकाना,फिर दिखा अपना जिगर 

एक गाना याद आता है, जो तुझे समर्पित है-

मैं  तेरे इश्क़ में, मर ना जाऊँ कहीं,
तू मुझे आज़माने की कोशिश ना कर
खूबसूरत है तू,  तो हूँ में भी हसीन,
मुझसे नज़रें चुराने की कोशिश ना कर

शौक से तू मेरा इम्तिहान ले,
तेरे कदमों में रख दी है जान ले,
बेखबर, बेकदर, मान जा ज़िद्ध ना कर
तोड़कर दिल मेरा आए मेरे हमनशीं
इस तरह मुस्कुराने की कोशिश ना कर

मैं  तेरे इश्क़ में,

फेर ली क्यों नज़र मुझसे रूठ कर
दिल के तुड़के हुए टूट-टूट कर
क्या कहा दिलरुबा तू है मुझसे खफा
के बहाने है येह, येह  हकीकत नहीं,
तू बहाने बनाने की कोशिश ना कर

मैं  तेरे इश्क़ में,

कब से बेठी  हूँ  में इंतज़ार में,
झूठा वाडा ही कर कोई प्यार में
क्या सितम है सनम, तेरे सर की कसम
याद चाहे ना कर, तो मुझे गम नहीं
हाँ, मगर भूल जाने की कोशिश ना कर

मैं तेरे इश्क़ में, मर ना जाऊँ कहीं,
तू मुझे आज़माने की कोशिश ना कर
खूबसूरत है तू,  तो हूँ में भी हसीन,
मुझसे नज़रें चुराने की कोशिश ना कर


Monday, November 3, 2014

नैन तुम्हारे अति निराले

ओ मृगनैनी चपल सुंदरी 
नैन तुम्हारे अति निराले 
देखते ही मैं खो जाता 
जैसे तुम में हों मधु-प्याले 

मद-भरे होठों को देख 
छूने को मन होता बेहाल 
नाक पकड़ इक्छा होती 
पूछूँ क्या है गोरी-तेरा हाल 

माशा-अल्लाह तेरे गाल 
छुपा लिया है डिंपल को 
छूने को हाथ बढ़ जाता 
देख मनमोहक तस्वीर को 

तेरे देखने का नायब अंदाज़
है बहुत ही मनमोहक सा 
खुशनुमा माहौल छा जाता
झूम जाता मन सावन सा 

उस दिन मन बेचैन हो गया था 
जब देखा था तुझे ख़ामोशी में 
देख के तेरा ये दमकता चेहरा 
लगा कि तू है बहुत गर्मजोशी में 

तुझे भी दिल में नहीं है कि 
भेंट करे इतने दिन के बाद 
तभी तो बस तुम खामोश हो
नहीं करते तुम कोई फ़रियाद 

मेरा क्या है - मैं तो हूँ 
तेरे लिए एक दुःख का सागर 
जितना दूर रहूँगा तुझसे मैं 
उतना ही भरोगे तुम मन-के गागर 

दुःख-सुख तो है बस एक माया 
छाया रहता है मानव मन पर 
जबतक अज्ञान में रहता मानव  
तड़पता रहता अँधेरा देखकर  

ज्ञान-अज्ञान के इस चक्कर में 
हम रहते आये एकदूसरे से भिन्न 
ना तुझे जल्दी है-ना मुझे जल्दी है
हमदोनों हैं अनवरत राह के जिन्न  

ना सुनने कि अगर मुझे जल्दी होती 
कब का फैसला ये दिल ले लिया होता 
तुम तो हो अनमोल अनूठे मुसाफिर 
तुमपर कोई दवाब कभीं नहीं मैं देता 

मिले-न-मिले तुझे कोई फर्क नहीं पड़ता 
एक-से-एक नायाब मित्र भरे-पड़े हैं तेरे पास 
जो कर देते पूरा तेरा-हर-कमी का अहसास 
मेरे पास एक ज्ञान है जो देता है बस आस 

ओ मृगनैनी चपल सुंदरी 
नैन तुम्हारे अति निराले 
देखते ही मैं खो जाता 
जैसे तुम में हों मधु-प्याले 



Saturday, November 1, 2014

तुझे गमगीन देख दिल तड़प उठा

क्यों तुझे गमगीन देख 
दिल तड़प जाता है 
क्यों तुझे खुशहाल देख 
दिल खुश हो जाता है 

देखा जो तेरा गमगीन तस्वीर   
मेरा दिल सचमुच तड़पने लगा 
किस सोच में आज डूबे हो तुम 
मैं सोच में यहाँ सही में डूबने लगा 

तुम अच्छे लगते हो मुस्कुराते हुए 
मत गमगीन दिखा अपने को  मुझे 
नहीं दे सके तुम प्यार,कोई बात नहीं  
तू खुश रहोगे, समझूंगा, मिल गया मुझे 

ना तेरा सन्देश आता, ना तेरा आदेश 
ऐसे में जाऊं कहाँ, तेरे किस गली-प्रदेश 
जैसे तैसे दिन बीतता, ख़त्म ना होती रात 
सचमुच तुझसे ऐसे जुड़ा जैसे छूट गया है देश 

नीला आसमान में खामोश चाँद 
क्यों आज सुना-सुना लग रहा है 
तेरे आँख की चमकती रौशनी 
भी थोड़ा-थोड़ा धुंधला लग रहा है 

हाथ टिकाये, दिल को थामे 
सचमुच मन की मूर्त लगते 
आओ गोरी - तुझे हंसा दूँ 
ये आँखे तुझे देखने को तरसते 

आज तुझे गमगीन देख 
सचमुच दिल तड़प गया है 
देखने को तुझे खुशहाल  
मेरा आँख सचमच भर गया है 

क्यों तुझे गमगीन देख 
दिल तड़प जाता है 
क्यों तुझे खुशहाल देख 
दिल खुश हो जाता है