Thursday, December 25, 2014

चलो अच्छा है

तुम्हें देखकर अच्छा लगा
चेहरे किताब पर
ऐसा लगा जैसे अब यह किताब है भरा-भरा
तुम छा गए किताब पर 
एक अलंकार की तरह
एक छंद की तरह 
आसमान में पतंग की तरह 
नदी में कमल की तरह 
समुद्र में तरंग की तरह 
रंग में लाल की तरह 
धूल में गुलाल की तरह 
चेहरे में आँख की तरह 
आँख में मृगनयनी की तरह
हम में तुम की तरह 
तुम में मैं की तरह 

चलो अच्छा है
तेरी ज़िन्दगी अब चलने लगी 
मौषम की तरह आने लगी 
गीत गुनगुनाने लगी 
फूल खिलने लगी 
बगिया चहकने लगी 
आँगन महकने लगी 
भौरें आने लगे 
और तू खिलखिलाने लगे.

चलो अच्छा है 
मेरे सिवा सब हैं तेरे साथ 
तुम्हें मेरी जरूरत नहीं
तुम्हें मेरी चाह नहीं 
जैसे पहले नहीं थी 
जैसे कभी नहीं थी.

चलो अच्छा है 
कुछ भी नहीं अच्छा है 
चलो अच्छा है तेरे लिए
कि मेरे लिए कुछ भी नहीं अच्छा है 
चलो अच्छा है 
चलो अच्छा है 

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