Friday, July 24, 2015

जाग्रत शाश्वत मैं

जाग्रत शाश्वत मैं
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कितना पल मैं जगा रहता हुँ
कितना पल मैं सोया रहता हुँ
इसका कौन करेगा हिसाब
अपने में ही खोया रहता हुँ

पूर्णतः जब मैं जगा रहता
तब ही अपने को पूर्ण मानता
वरना मैं शून्य के अनुभव में
अपने में ही मुस्कुराता रहता

अजीब स्थिति हो गयी है यह मेरी
कोई ना परीक्षक और ना ही शिक्षक
ज़रुरत भी नहीं किसी परीक्षा का
फिर भी दिल चाहता एक निरीक्षक

औरों को देख लगता नहीं जीवन जिया
लगता बचपन अभी है बिता रीता सा
रीता सा ही जवानी भी बीतता गया
बुढ़ापे के दर पर महसूसता जीवन सा

असन्तोष और निराशा होता 
तो ये सब नहीं लिखता रहता
कहीं परेशान सा रहता भटकता
पागल, वहशी या और कुछ होता

पर परेशान रहने की जगह मैं
कर रहा हूँ बीते पल की विवेचना 
एक जाग्रत शाश्वत विवेकी सा 
दिल चाहता बस युहीं मुस्कुराना 

जीवन को देखता एक राह सा
अनवरत चलता हुआ सीमाहीन सा
सोते जगते खोते हुये देख रहा
कहता - क्यों करूँ दर्द दुःख सा

निष्कर्ष ......
पल पल गाता जाता मैं
प्रेम में खोता जाता मैं
कोई है-जो हो राही मुझ सा
और चलता रहे बनकर मैं

मैं सावन सावन कहता
तुम भादो बन कर आते
मेरे रूखे सूखे मन में
रिमझिम सा बरस जाते

Wednesday, July 1, 2015

दो-दो चाँद -फिर भी मन उखड़ा उखड़ा

दो-दो चाँद -फिर भी मन उखड़ा उखड़ा
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जिन्दा तो हम थे पहले भी
जिन्दा हम रहेंगे आगे भी
वर्तमान में बस होते अज्ञानी
जिसमे घबराते रहते सभी

एक चाँद खूबसूरत है बहुत
दूजा चाँद भी आ जायेगा
पर मृगनयनी के दर्शन का
वो स्वर्णिम पल कब आएगा

जिसके दो नयन हैं चाँद से
मुखड़ा रहता दमकता हुआ
जब भी देखता या सोचता
बस महसूसता खोता हुआ

कितने ही तो  चाँद हैं इस जगत में
धरती का चाँद है दिल का टुकड़ा
इसकी चमक भी फीकी दिखती
जब से  रहने लगा मेरा चाँद उखड़ा


देखा जो तुझे भीड़ में

देखा जो तुझे भीड़ में 
अंग अंग थे दमके हुए
मादकता छाया हुआ था 
तेरे बदन से लिपटे हुए 
छा गया मैं अजब नशा में 
कुछ-कुछ मदहोश होते हुए 
कब लिखने बैठ गया मैं 
तेरे प्रति प्रेम जताते हुए 

तू कितना भी कह लो मृगनैनी 

नहीं दूर हो पाउँगा दूर रहते हुए 
चाहे तू जी ले मुझसे दूर कहीं 
पर हर पल तू होते घुलते हुए 

तेरे नैनो की भाषा दिल में है पढ़ना 

तेरा कभी मटकाना, कभी फुदकना 
लचक-लचक कर इतरा कर चलना
दिल से हँसना, युहीं खिलखिलाना 

मधुर संगीत सा तेरा यूँ लय में बंधना 
उमड़-घुमड़ कर यूँ बदली सा टहलना 
तेरा कभी इतराना - कभी इठलाना 
हलकी-हलकी सी नाजुकता से शर्माना 

बहका देता है मेरे दिल का हर कोना 

अंग - अंग हो जाता है सोना - सोना 
तुझ संग रमना, तेरे ही  संग चलना 
मेरा यह है कहना-पर तेरा चुप रहना 

ला देता है हलचल मेरे जीवन में 

दिल कर जाता रोते हुए 
बच्चों सा कुछ मांगते हुए 
बड़ा अपने को न समझते हुए 
कुछ लजाते हुए 
कुछ शरमाते हुए 
संग चलने का कल्पना करते हुए 
तेरे अंगों में गुदगुदी लगाते हुए 
लाल-लाल चुनरी को छेड़ते हुए 
तेरे उजले दामन में रंग भरते हुए 
तुझे मुस्काते हुए 
तुझे हंसी लगाते हुए 
जीवन में तेरे संग गीत गाते हुए 
अपना समय बिताते हुए 
तुझसे कुछ-कुछ कहते हुए 
तुझे अपना राग पढ़ाते हुए 
नहीं कटता तेरे बिन जीवन का दौर 
पर किसी तरह काटते हुए 
खो जाता हूँ अक्सर तेरी याद करते हुए