तेरे नशीली आँखों का
मैं था कभी दीवाना
तूने जो आँखे फेरी
खो गया मेरा ठिकाना
तेरे नशीली अदाओं का
हूँ अब भी मैं दीवाना
नहीं पाया कोई तुझसा
सब लगते हैं अंजाना
दर्दों के साये में रहूँ या ना रहूँ
पर तू जो नहीं मेरे साथ
दिल करता- मैं दर्द में रहूँ
और हरपल ले लूँ तुझे साथ
हरवक्त महसूसता हूँ कि
तेरे लिये मैं दर्द क्यों ना करूँ
तुम मिल जाते तो जन्नत सा था
ऐसे में तुझे न चाहूँ तो क्या करूँ
देखो, तुम कितने अनमोल हो
तुझे चाहते चाहते-खुदा देखने लगा
कब से चाह थी कि खुदा को देखूं
अब भी पूछोगे-तुझे क्यों चाहने लगा
तेरे मुस्कराहट से जो आहट आती
मधुर-मधुर छंद दिल में मुस्काती
कभी इतराती- कभी बलखाती
नदी सी कल-कल निश्छल बहती
तेरे इंतज़ार में रोज अपने को देखते
आईने से कुछ न कुछ बात करता
कभी मुस्कुराता-कभी खिलखिलाता
तेरे यादों में घंटो युहीं निकल जाता
तेरे सुरमई अदाओं का
रहूँगा हमेशा मैं दीवाना
नहीं मिलेगा कोई तुझसा
सब लगते हैं अंजाना

