Wednesday, May 27, 2015

सुरमई सी नशीली अदा

तेरे नशीली आँखों का 
मैं था कभी दीवाना 
तूने जो आँखे फेरी 
खो गया मेरा ठिकाना 

तेरे नशीली अदाओं का
हूँ अब भी मैं दीवाना 
नहीं पाया कोई तुझसा  
सब लगते हैं अंजाना 

दर्दों के साये में रहूँ या ना रहूँ 
पर तू जो नहीं मेरे साथ
दिल करता- मैं दर्द में रहूँ 
और हरपल ले लूँ तुझे साथ 

हरवक्त महसूसता हूँ कि 
तेरे लिये मैं दर्द क्यों ना करूँ 
तुम मिल जाते तो जन्नत सा था 
ऐसे में तुझे न चाहूँ तो क्या करूँ 

देखो, तुम कितने अनमोल हो 
तुझे चाहते चाहते-खुदा देखने लगा 
कब से चाह थी कि खुदा को देखूं
अब भी पूछोगे-तुझे क्यों चाहने लगा 

तेरे मुस्कराहट से जो आहट आती
मधुर-मधुर छंद दिल में मुस्काती 
कभी इतराती- कभी बलखाती 
नदी सी कल-कल निश्छल बहती 

तेरे इंतज़ार में रोज अपने को देखते 
आईने से कुछ न कुछ बात करता 
कभी मुस्कुराता-कभी खिलखिलाता
तेरे यादों में घंटो युहीं निकल जाता 

तेरे सुरमई अदाओं का
रहूँगा हमेशा मैं दीवाना 
नहीं मिलेगा कोई तुझसा  
सब लगते हैं अंजाना 

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