दर्द भी नशा की तरह है ..
जितना नशा करो,
उतना नशा बढ़ता जाता है
दर्द को भी जितना महसूस करो,
दर्द उतना बढ़ता जाता है
भावनाहीन मनुष्य भावुक नहीं होता है
क्या भावुक बना जाय या नहीं
यह भी एक ज्ञान जैसा ही है
अगर ज्ञान हो जाय कि
भावुक बनना है या नहीं
तो दर्द भी दर्द जैसा नहीं होता
दर्द का आभास तो होता
लेकिन दर्द में तड़पने के बजाय
मुस्कराहट nikal जाता
और दिल यही कहता -
रही होगी उसे कोई मज़बूरी
तभी तो उसने ध्यान नहीं दिया
ऐसे दर्द को क्या दर्द समझूँ
जिसकी कोई गिनती ही ना किया
जितना नशा करो,
उतना नशा बढ़ता जाता है
दर्द को भी जितना महसूस करो,
दर्द उतना बढ़ता जाता है
भावनाहीन मनुष्य भावुक नहीं होता है
क्या भावुक बना जाय या नहीं
यह भी एक ज्ञान जैसा ही है
अगर ज्ञान हो जाय कि
भावुक बनना है या नहीं
तो दर्द भी दर्द जैसा नहीं होता
दर्द का आभास तो होता
लेकिन दर्द में तड़पने के बजाय
मुस्कराहट nikal जाता
और दिल यही कहता -
रही होगी उसे कोई मज़बूरी
तभी तो उसने ध्यान नहीं दिया
ऐसे दर्द को क्या दर्द समझूँ
जिसकी कोई गिनती ही ना किया
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