Thursday, March 30, 2017

दुःख का हल

जीवन में दुःख आते है, हम मनुष्य परेशान हो जाते, ...इसी भाव पर अर्ज है एक कविता ...

एक से एक तकलीफ है
कौन इनका निर्वाह करे
जीवन हो जाता कठिन
कौन इसका प्रवाह करे

साधना पड़ता अर्जुन  की  तरह
चीरना पड़ता नदी की तेज धारा
तपाना पड़ता शरीर के अंग-अंग
फिर बजती चैन  बंसी की धारा

कितने उलझ जाते सुलझकर
कितने ही राह में उलझा देते हैं
सारा दोष अपने सिर आ जाता
हर पल त्राहि त्राहि मच जाते हैं

कौन निकाले इस विपदा से
कौन सवांरे इस तकलीफ में
कौन उक्त करूँ निकलने का
कौन चीर दे इस चीरहरण में

मंदिर से नाता जुड़ने लगता
पत्थर का मूर्ति सुनने लगता
हे पालनहार हमें उबार करो
जीवन की नैया डूबने लगता

फिर बिजली कौंधती सुने गगन में
एक अनोखी तरंग तन में आ जाती
चलने लगता चप्पू दुःख की नदी में
धीरे धीरे से नाव किनारे लग जाती

मुस्कुराहट की लहर दौड़ती
मित्रगण को धन्यवाद करते
चैन की  बंशी बजने लगती
दुःख से  निवारण  हो जाते

सच में दुःख-विपदा सवंर जाते
बस व्यस्त रहें व्यवस्थित करते
हिम्मत ना हारे,रहे चलते चलते
जीवन के राह में,रहें आगे बढ़ते

-बीरेन 😊

Sunday, March 26, 2017

एक दूसरे की सहायता करे ... क्यों

क दूसरे की सहायता करे ... क्यों ...अर्ज़ है चन्द शेर...

हैं इस जहान में अकेले हमसब,मिल के दे दो साथ
थकान हमारी मिट जायगी,तेरे मुस्कुराहट के साथ

हैं हम सब रब के नूर,हर एक में है वही नूर
अज्ञान में आकर दूर हो जाते,ना जाओ दूर

दुनिया इसलिए नहीं बनी कि यह दुनिया युहीं बननी थी
दुनिया इसलिए बनी कि दुनिया रब के नूर से चलनी थी

कैसे समझे हम इस नूर को,क्या ये नूर बहुत विस्मयकारी है
नूर है बहुत सरल समझने में ,कोशिश करने पर भ्रमकारी है

देते रहो सहायता हर एक नूर को, जितना तक सम्भव हो सके
मिटाते रहो अंधकार अज्ञान का,थोड़ा भी यदि अज्ञान हट सके

-बीरेन 😊

भक्ति क्या है

भक्ति क्या है ...

भक्त लगाता भाव भगवन से
जोड़ता भाव इस भवसागर में
हे दीन दयाल भगवन मेरे
एक भाव जुड़ा है भगवन में

क्यों करते हम भाव की पूजा
भगवन के लिए भक्ति क्या जरूरी है
यह दुनिया उसकी हम उसके
क्या भगवन से भाव जताना जरुरी है

भले यह दुनिया उसकी,
पर हम ये दुनिया अपना बना लेते
भूलकर इस दुनिया में
अपना अलग दुनिया हम बसा लेते

यह धरती है यह दुनिया है
इस भाव में हम डूब जाते
नैया डगमगाती हम डरते
डर में जीवन  बीत जाते

ना डर मेरा, ना नैया मेरी
डगमगाती रहे यह दुनिया डर डर में
हे प्रियतम प्राण प्रभु मेरे
यह दुनिया मेरी नहीं,कह देता भक्त भक्ति में

भवसागर बनाकर भाव दिया
क्यों सागर से डरूँ भवसागर में
हे दिनदयाल प्रभु मेरे
अर्पित है सबकुछ मेरा तुझमें

-बीरेन

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1315071531912700&id=107437659342766

Saturday, March 18, 2017

जलेबी बाई

किसी ने ये कहा ..

*जलेबी खाते वक्त एक बात याद आई...*
*कि खुद कितने भी उलझे रहो पर दूसरो को हमेशा मिठास दो।*
   🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

इस जलेबी के उलझन पर अर्ज़ किया है ....

जलेबी उलझकर लड़ी में एक कड़ी बन जाती है
डूबकर चाशनी में मुँह में स्वतः घुलती जाती है

कभी सोचती नहीं जलेबी कि खुद क्यों उलझी हुई है
जीवन है उलझने के नाम मिठास उसी में पड़ी हुई है

शांत जीवन है तिजोरी सा,घर की केवल शोभा बढ़ाता
जीवन है कल कल  नदी सा उलझकर भी बहता जाता

नदी किसी की प्यास बुझाता,कितनों का जीवन पालता
पानी की शीतलता उड़ेलकर जीवों के संग बिखर जाता

अर्ज़ किया है दो शेर...

आये हैं बड़ी दूर से,कम से कम मुँह मीठा कीजिये
जलेबी सा भले जीवन हो,थोड़ा तो मिठास लीजिये

यूँही कैसे चले जायेंगे बिन मिठास के
जलेबी बनकर मिठास पैदा कीजिये
गर्म गर्म कड़ाही में तलकर जलेबी सा
आसपास में अपनी मिठास फैलाइये

-बीरेन 😊

जिस्म का रूह

अर्ज़ हैं इस रूह और जिस्म के माया जाल पर.....

रूह ही है वह अनुपम जिस्म, जिसे मैं महसूसता हूँ
जिस्म से वह निकल कर किधर जाता, ये देखता हूँ

जिस्म को हम सब दफना देते रूह निकल जाने के बाद
जिस्म में रूह की कद्र नहीं करते,फिर रोते,जाने के बाद

क्या सही है,क्या गलत है,दुनिया में समझ नहीं पाता ये मानव
जब तक समझ आता,तब तक सब लूट लेता,समय का दानव

गोल गोल धरती घूमती फिर से उस बिंदु पर आकर
कहती-रिश्ता फिर पुनर्जीवित कर लो,ये पल पाकर

खोया पल पाकर भी व्यस्त रहते, पुनर्जीवित  नहीं करते
उधेर बुन में हम समय गवां देते,नए नए सपना सजा लेते

-बीरेन 😊