Saturday, March 18, 2017

जलेबी बाई

किसी ने ये कहा ..

*जलेबी खाते वक्त एक बात याद आई...*
*कि खुद कितने भी उलझे रहो पर दूसरो को हमेशा मिठास दो।*
   🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

इस जलेबी के उलझन पर अर्ज़ किया है ....

जलेबी उलझकर लड़ी में एक कड़ी बन जाती है
डूबकर चाशनी में मुँह में स्वतः घुलती जाती है

कभी सोचती नहीं जलेबी कि खुद क्यों उलझी हुई है
जीवन है उलझने के नाम मिठास उसी में पड़ी हुई है

शांत जीवन है तिजोरी सा,घर की केवल शोभा बढ़ाता
जीवन है कल कल  नदी सा उलझकर भी बहता जाता

नदी किसी की प्यास बुझाता,कितनों का जीवन पालता
पानी की शीतलता उड़ेलकर जीवों के संग बिखर जाता

अर्ज़ किया है दो शेर...

आये हैं बड़ी दूर से,कम से कम मुँह मीठा कीजिये
जलेबी सा भले जीवन हो,थोड़ा तो मिठास लीजिये

यूँही कैसे चले जायेंगे बिन मिठास के
जलेबी बनकर मिठास पैदा कीजिये
गर्म गर्म कड़ाही में तलकर जलेबी सा
आसपास में अपनी मिठास फैलाइये

-बीरेन 😊

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