क्या तुझे कोई सवाल नहीं है
कुछ बात करते रहने का
क्या सारी बातें मेरी ही है
तुझसे बात करते रहने का
कयामत का धैर्य है तुझमें
सामने रहकर भी चुप रह जाते
जब तुम रहते हो सामने
मुझसे चुप नहीं रहे जाते
कुछ तो हौसला दो
बात शुरू करने का
कोई अनुभव नहीं है
मुझे शुरुआत करने का
चलो शुरुआत कुछ बात का
आज शाम में हमने कर दिया
अब ये दोष नहीं देना मुझे
कि मैंने बात शुरू नहीं किया
एक बात बोलूँ- तुम ऐसे ही चले आओ
और चल पड़ते हैं हमदोनों सफर पर
पूछूँगा भी नहीं किसी से या तुमसे
कि जाना है किधर,बस होगा एक सफर
**************
बिन कहे कुछ तुम ऐसे चले गए
जैसे कि मेरा कुछ वजूद ही नहीं
हंसी आती है, पर कोई गुस्सा नहीं
क्योंकि रूह से प्यार है तन से नहीं
ऐसा नहीं कि तुझे कम आँकता हूँ
ऐसा भी नहीं कि मुझमें कमी है
ऐसा महसूसता हूँ मैं तुझमे निहित हूँ
जन्मों जन्मों से तेरे इन्तजार में हूँ
भले तुम हँसकर टाल दो-महसूस को
भले तुम तव्वजो नहीं दो इस प्यार को
मगर मुझे कोई इसमें हँसी नहीं दीखता
और हरवक्त तव्वजो देता इस चाह को
मुझे संज्ञान है पर रावण सा नहीं है
मुझे ध्यान है पर दुर्योधन सा नहीं है
पूर्ण सन्तुलन में हूँ और अधीर भी नहीं
प्रकृति के सब रंग की मुझे पहचान है
बिना इज्जत के तो मैं खाता भी नहीं
बिना इजाजत के छु दूँ ऐसा भी नहीं
प्यार करके मरता जरूर हूँ तुझ पर
मगर कोई जिल्लत सहूँ, ऐसा भी नहीं
हमने पहचाना है रूह की शख्सियत
इस शरीर का तो कोई मोल ही नहीं
तुम समझते रहो- खोते रहो मौज में
मेरा दौर कही और है,पर मौज में नहीं
कुछ बात करते रहने का
क्या सारी बातें मेरी ही है
तुझसे बात करते रहने का
कयामत का धैर्य है तुझमें
सामने रहकर भी चुप रह जाते
जब तुम रहते हो सामने
मुझसे चुप नहीं रहे जाते
कुछ तो हौसला दो
बात शुरू करने का
कोई अनुभव नहीं है
मुझे शुरुआत करने का
चलो शुरुआत कुछ बात का
आज शाम में हमने कर दिया
अब ये दोष नहीं देना मुझे
कि मैंने बात शुरू नहीं किया
एक बात बोलूँ- तुम ऐसे ही चले आओ
और चल पड़ते हैं हमदोनों सफर पर
पूछूँगा भी नहीं किसी से या तुमसे
कि जाना है किधर,बस होगा एक सफर
**************
बिन कहे कुछ तुम ऐसे चले गए
जैसे कि मेरा कुछ वजूद ही नहीं
हंसी आती है, पर कोई गुस्सा नहीं
क्योंकि रूह से प्यार है तन से नहीं
ऐसा नहीं कि तुझे कम आँकता हूँ
ऐसा भी नहीं कि मुझमें कमी है
ऐसा महसूसता हूँ मैं तुझमे निहित हूँ
जन्मों जन्मों से तेरे इन्तजार में हूँ
भले तुम हँसकर टाल दो-महसूस को
भले तुम तव्वजो नहीं दो इस प्यार को
मगर मुझे कोई इसमें हँसी नहीं दीखता
और हरवक्त तव्वजो देता इस चाह को
मुझे संज्ञान है पर रावण सा नहीं है
मुझे ध्यान है पर दुर्योधन सा नहीं है
पूर्ण सन्तुलन में हूँ और अधीर भी नहीं
प्रकृति के सब रंग की मुझे पहचान है
बिना इज्जत के तो मैं खाता भी नहीं
बिना इजाजत के छु दूँ ऐसा भी नहीं
प्यार करके मरता जरूर हूँ तुझ पर
मगर कोई जिल्लत सहूँ, ऐसा भी नहीं
हमने पहचाना है रूह की शख्सियत
इस शरीर का तो कोई मोल ही नहीं
तुम समझते रहो- खोते रहो मौज में
मेरा दौर कही और है,पर मौज में नहीं


