ऐ दिल तुम्हें चाहूँ ऐसे
कि मैं तुझे सखी कहूँ
मत रह दूर तुम हमसे
कि मैं इसे बेरुखी कहूँ
इतना तुम्हें चाहूँ तुझे
कि ऐ दिल तुझे अपना कहूँ
मत दूर हो तुम ऐसे हमसे
हरवक्त तुमसे कहता रहूँ
ऐ दिल तुम्हें चाहूँ ऐसे
कि मैं तुझे सखी कहूँ .......
कैसे कहूँ कि तुम हो कितने
सलोने भी अपने भी
मेरा दिल तड़पता रहता है
जानते भी मानते भी
फिर क्यों दूर हो तुम हमसे
बताओ भी जताओ भी
कि अब दिल मेरा लगता नहीं
समझो भी समझाओ भी
ऐ दिल तुम्हें ऐसे चाहूँ
कि मैं तुम्हें सखी कहूँ ........
पता है तुम्हें क्या प्रभु शंकर ने
कहा था माँ सती से ऐसे ही
कि मत ले परीक्षा तू प्रभु राम का
जब वो सिया को वन में ढूंढे कहीं
मगर माँ सती नहीं मानी
और चुपके से सिया बन बैठी कहीं
वन में भटकते जब राम ने देखा-पूछा
माँ संग में प्रभु शंकर दिख रहे नहीं
माँ सती ऐसे सकुचाई
कि घबराकर अन्तर्ध्यान हो गई वहीं
लड़खड़ाते हुए कैलाश पहुंची
और ऐसे जताई जैसे कुछ हुआ हो नहीं
लेकिन ये भगवान शंकर हैं
जिनसे कुछ भी छुपता नहीं
ध्यान लगाकर जब वे देखे
ये क्या किया सती-बोल पड़े वहीँ
माँ सिया का तू रूप लेकर
अब कैसे तुम्हें मानु प्रिय सती
मेरी सती जो बस अपनी है
कैसे पाऊँ किसी और में सती
वैराग्य छा गया शंकर में
नहीं चाहा कोई रंग-राग भी
इतना चला ये कहानी
कि सती को त्यागना पड़ा शरीर भी
फिर लेकर पुनर्जन्म सती आई
हिमालय राजा के घर पार्वती बनकर
तपस्या की खूब घनघोर
तब कहीं जाकर मिली पार्वती को शंकर
तबतक इन्तजार में रहे शंकर
प्रेम में विह्वल सती के लिए
हे प्राणप्रिय हे सखीप्रिय
शंकर है बस पार्वती तेरे लिए
कितनी अच्छी है यह घटना
जन्म जन्म से चल रही
शंकर संग पार्वती की सुधि
प्रेम प्यार में घुलती रही
आओ तुम सती सा बनकर
आओ भी पार्वती सा बनकर
जन्म जन्म से खोज रहा
मैं तुझे शंकर सा बनकर
ऐ दिल तुम्हें चाहूँ ऐसे
कि मैं तुझे हमेशा सखी कहूँ
मत रह दूर तुम हमसे
कि मैं इसे तेरा बेरुखी कहूँ
कि मैं तुझे सखी कहूँ
मत रह दूर तुम हमसे
कि मैं इसे बेरुखी कहूँ
इतना तुम्हें चाहूँ तुझे
कि ऐ दिल तुझे अपना कहूँ
मत दूर हो तुम ऐसे हमसे
हरवक्त तुमसे कहता रहूँ
ऐ दिल तुम्हें चाहूँ ऐसे
कि मैं तुझे सखी कहूँ .......
कैसे कहूँ कि तुम हो कितने
सलोने भी अपने भी
मेरा दिल तड़पता रहता है
जानते भी मानते भी
फिर क्यों दूर हो तुम हमसे
बताओ भी जताओ भी
कि अब दिल मेरा लगता नहीं
समझो भी समझाओ भी
ऐ दिल तुम्हें ऐसे चाहूँ
कि मैं तुम्हें सखी कहूँ ........
पता है तुम्हें क्या प्रभु शंकर ने
कहा था माँ सती से ऐसे ही
कि मत ले परीक्षा तू प्रभु राम का
जब वो सिया को वन में ढूंढे कहीं
मगर माँ सती नहीं मानी
और चुपके से सिया बन बैठी कहीं
वन में भटकते जब राम ने देखा-पूछा
माँ संग में प्रभु शंकर दिख रहे नहीं
माँ सती ऐसे सकुचाई
कि घबराकर अन्तर्ध्यान हो गई वहीं
लड़खड़ाते हुए कैलाश पहुंची
और ऐसे जताई जैसे कुछ हुआ हो नहीं
लेकिन ये भगवान शंकर हैं
जिनसे कुछ भी छुपता नहीं
ध्यान लगाकर जब वे देखे
ये क्या किया सती-बोल पड़े वहीँ
माँ सिया का तू रूप लेकर
अब कैसे तुम्हें मानु प्रिय सती
मेरी सती जो बस अपनी है
कैसे पाऊँ किसी और में सती
वैराग्य छा गया शंकर में
नहीं चाहा कोई रंग-राग भी
इतना चला ये कहानी
कि सती को त्यागना पड़ा शरीर भी
फिर लेकर पुनर्जन्म सती आई
हिमालय राजा के घर पार्वती बनकर
तपस्या की खूब घनघोर
तब कहीं जाकर मिली पार्वती को शंकर
तबतक इन्तजार में रहे शंकर
प्रेम में विह्वल सती के लिए
हे प्राणप्रिय हे सखीप्रिय
शंकर है बस पार्वती तेरे लिए
कितनी अच्छी है यह घटना
जन्म जन्म से चल रही
शंकर संग पार्वती की सुधि
प्रेम प्यार में घुलती रही
आओ तुम सती सा बनकर
आओ भी पार्वती सा बनकर
जन्म जन्म से खोज रहा
मैं तुझे शंकर सा बनकर
ऐ दिल तुम्हें चाहूँ ऐसे
कि मैं तुझे हमेशा सखी कहूँ
मत रह दूर तुम हमसे
कि मैं इसे तेरा बेरुखी कहूँ
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