Tuesday, August 23, 2016

उसने समझा मेरा कोई वजूद नहीं

क्या तुझे कोई सवाल नहीं है 
कुछ बात करते रहने का
क्या सारी बातें मेरी ही है 
तुझसे बात करते रहने का

कयामत का धैर्य है तुझमें
सामने रहकर भी चुप रह जाते
जब तुम रहते हो सामने 
मुझसे चुप नहीं रहे जाते 

कुछ तो हौसला दो
बात शुरू करने का
कोई अनुभव नहीं है 
मुझे शुरुआत करने का

चलो शुरुआत कुछ बात का
आज शाम में हमने कर दिया
अब ये दोष नहीं देना मुझे 
कि मैंने बात शुरू नहीं किया 

एक बात बोलूँ- तुम ऐसे ही चले आओ
और चल पड़ते हैं हमदोनों सफर पर
पूछूँगा भी नहीं किसी से या तुमसे 
कि जाना है किधर,बस होगा एक सफर

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बिन कहे कुछ तुम ऐसे चले गए
जैसे कि मेरा कुछ वजूद ही नहीं 
हंसी आती है, पर कोई गुस्सा नहीं 
क्योंकि रूह से प्यार है तन से नहीं

ऐसा नहीं कि तुझे कम आँकता हूँ
ऐसा भी नहीं कि मुझमें कमी है 
ऐसा महसूसता हूँ मैं तुझमे निहित हूँ
जन्मों जन्मों से तेरे इन्तजार में हूँ 

भले तुम हँसकर टाल दो-महसूस को
भले तुम तव्वजो नहीं दो इस प्यार को
मगर मुझे कोई इसमें हँसी नहीं दीखता
और हरवक्त तव्वजो देता इस चाह को 

मुझे संज्ञान है पर रावण सा नहीं है
मुझे ध्यान है पर दुर्योधन सा नहीं है
पूर्ण सन्तुलन में हूँ और अधीर भी नहीं
प्रकृति के सब रंग की मुझे पहचान है 

बिना इज्जत के तो मैं खाता भी नहीं
बिना इजाजत के छु दूँ ऐसा भी नहीं
प्यार करके मरता जरूर हूँ तुझ पर
मगर कोई जिल्लत सहूँ, ऐसा भी नहीं 

हमने पहचाना है रूह की शख्सियत 
इस शरीर का तो कोई मोल ही नहीं 
तुम समझते रहो- खोते रहो मौज में 
मेरा दौर कही और है,पर मौज में नहीं 

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