Saturday, September 3, 2016

दिल और आँख

दिल और आँख पर कुछ विचार ..

कितना क्रूर वक्तव्य है जब कोई नहीं देख पाता
बस अनुभव से छूता, अंदर ही अंदर बात करता

दिल से दिल में समझता,दिल से दिल को समझाता
दिल ही दिल में बात करता, दिल ही दिल से सुनता 

कोई जरूरी नहीं कि 
जिसकी आँखे नहीं है वह ही ऐसा करता
ये भी कोई जरूरी नहीं कि
जिसकी आँखे हैं वह ऐसा नहीं करता

कोई अपने प्रियवर  की याद, अपने  दिल में ही तो करता
आँखे होकर भी क्या फर्क पड़ता, बस दिल से याद करता

ये दिल भी क्या चीज है, आँखे का काम करता
कोई दूर है इस आँख से, पर दूर नहीं रहने देता

ये आँखे भी क्या चीज है,दिलवर को नहीं देखता
फिर आँसू बहाता और दिल की आँखों से देखता

कितनी अभूतपूर्व बाते घटती पर कोई अनुभव नहीं कर पाता
आँख से आँसू बहाता,फिर उसे पोछता,फिर कर्म में लग जाता

दिल से उस दिल को देखने को दिल पर छोड़ देता
दिल ही दिल में बातकर दिल में  सन्तोष कर लेता 




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