Friday, September 9, 2016

कुछ वक्त पर

अर्ज़ है ... कुछ वक्त पर

किन्हें फुर्सत है पीछा करने की
तुझे फुर्सत ही नहीं सुनने की

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फुर्सत ही फुर्सत में ऐसा लगता 
फसल लगाई है मैंने फुर्सत की


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तुम आ भी जाओ कुछ वक्त लेकर
या मुझे बुला लो कुछ वक्त देकर

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वक्त ही वक्त है देने को तेरे लिए
क्योंकि जिन्दा हूँ बस तुझे देखकर

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कोई चाहत नहीं, होती भी तो मिट जाती
बस तुझमें खो जाऊँ,हरवक्त दिल चाहती

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तेरे संग रहने की कल्पना कर मुस्कुरा लेता हूँ कुछ वक्त

वरना इतना भाग्य कहाँ कि मैं पा लूँ और रह लूँ हरवक्त




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