Wednesday, July 10, 2019

चल आ फिर से हिसाब करूँ

चल आ फिर से हिसाब करूँ

एक ग़ज़ल ....

चल आ फिर से हिसाब करूँ
बहुत दिन से जवाब आया नहीं 
अपना खाता बही ठीक करूँ
बहुत दिन से बकाया आया नही 

तेरे संग संग थोड़ा हँस लूँ
वर्षों से तेरा हँसी सुना नहीं 
तेरे संग बैठकर मुस्कुरा लूँ
बहुत दिन से मुस्कुराया नहीं 

चल आ तुझसे ....

तेरे लहलहाती जीत की खुशी में
तेरा उमंग सामने से देखा नहीं 
कितने मासूम तुम दिखते हो
सदियों से नजदीक से देखा नहीं 

चल आ तुझसे ....

तुम्हारे चँचल शोख आँखे की
अरसे से शरारत देखा नहीं 
तेरे सुर्ख गुलाबी होठों पर
फैली नजाकत देखा नहीं 

चल आ तुझसे ....

कभी मान जा इशारों से भी
पता नहीं क्यों मानते नहीं 
ऐसे तुम हमसे व्यवहार करते
जैसे तुम मुझे जानते नहीं 

चल आ तुझसे ....

ये कैसे तुझे समझाऊँ कि
किस दिन तुम याद आते नहीं 
किस दिन में किस पल को
तुम हमें सताते नहीं 

चल आ तुझसे ....

-बीरेन ☺

Tuesday, April 11, 2017

Living in Feminism

On this post .. wish to say...

Promoting feminism, Living in feminism, being feminine, etc are not at all man-hating and neither men nor orthodoxy women should feel disturbed.

Living in Feminism is just like "a child lives". A child does not have knowledge that a child is boy or girl. Child is just child. Far far beyond from identification of boy and girl.

Same way feminism also exist. No influence of manliness, just they want to be in feminine way.

Let hair be airy
Let colors be applied
Let walk be melodious
Let talk be continuous

Let fly  like bird
Let have fun in mud
Let sing in chorus
Let swim in streams

This feeling is away from body
This feeling is far from society
This feeling is shining in universe
This feeling is glittering with stars

One step ahead from craziness
One step behind from madness
One step walks beyond another
One step backs the others

This feminism believes in bliss
This feminism supports creation
This feminism waves spirituality
This feminism not expect unionism

This is one
This is single
This is this
Just a feminine

-Biren 😊

Thursday, April 6, 2017

चल आ तुझसे हिसाब करूँ

एक ग़ज़ल ....

चल आ तुझसे हिसाब करूँ
बहुत दिन से जवाब आया नहीं है
अपना खाता बही ठीक करूँ
बहुत दिन से बकाया आया नही है

तेरे संग संग थोड़ा हँस लूँ
वर्षों से तेरा हँसी सुना नहीं है
तेरे संग बैठकर मुस्कुरा लूँ
बहुत दिन से मुस्कुराया नहीं है

चल आ तुझसे ....

तेरे लहलहाती जीत की खुशी में
तेरा उमंग सामने से देखा नहीं है
कितने मासूम तुम दिखते हो
सदियों से नजदीक से देखा नहीं है

चल आ तुझसे ....

तुम्हारे चँचल शोख आँखे की
अरसे से शरारत देखा नहीं है
तेरे सुर्ख गुलाबी होठों पर
फैली नजाकत देखा नहीं है

चल आ तुझसे ....

कभी मान जा इशारों से भी
पता नहीं क्यों मानते नहीं हो
ऐसे तुम हमसे व्यवहार करते
जैसे तुम मुझे जानते नहीं हो

चल आ तुझसे ....

ये कैसे तुझे समझाऊँ कि
किस तुम याद आते नहीं हो
किस दिन में किस पल को
तुम हमें सताते नहीं हो

चल आ तुझसे ....

-बीरेन ☺

Saturday, April 1, 2017

प्यार कैसा हो


इस दर्द भरे समाचार पर मेरे दिल ने रो दिया।सच में प्यार का मतलब लोग नहीं समझते और आवेश में आकर किसी को मार देते या खुद मर जाते । मरना तो सबको है , पर अज्ञान में मरना और मारना बुद्धिमान को शोभा नहीं देता । हम मनुष्य का जीवन जानवर जीवन से ऊपर है । अतः मूर्खतापूर्ण जीने से अच्छा है ज्ञानपूर्वक जीना । अगर आपको लगता है कि यह भाव अच्छा है तो आगे बढ़ावें ।

प्यार कैसा हो इस पर अर्ज़ किया है ...

प्यार में अक्सर हमें पाना नहीं होता
क्या ये नहीं समझते हम भारत वाले
प्यार में दिल से रिश्ता बनाया जाता
क्या ये नहीं जानते प्यार करने वाले

प्यार शरीर में नहीं पाया जाता
ये प्यार है दिल में  पाया जाता
प्यार है अमृत, प्यार  है  पूजा
प्यार करके  ही बताया  जाता

तन की तपिश को प्यार ना कहो
तन केवल रखता है इस दिल को
तन को केवल नहीं चाहा जाता
ये दिल छोड़ जाता है इस तन को

रब ने बनाया  हम सब के तन को
रब के कृति को यूँ बर्बाद ना करते
मजबूरी में कोई रिश्ता ना रख पाता
ये रब की रजा है,क्यों नहीं मान लेते

अगर किसी कारण ना मिल सका है प्यार
बैठकर तस्सली से थोड़ा तो बात कर लेते
ये रूह का रिश्ता सच चलता सदियों तक
ये दिल ही रूह है,कम से कम ये जान लेते

एक उम्र के बाद, ये शरीर है मर जाता
मगर रूह रहता हमेशा, ये याद रखते
प्यार होती है पहचान रूह से रूह का
इस रूह को अपने शरीर में पहचानते

फिर कैसे तकलीफ दे सकते हो तुम
अगर तुम सही में रूह को जान लेते
उस रूह को यादकर तुम मुस्कुरा लेते
ऐसे ही याद करते हैं उसको बता देते

मारकर बर्बाद ना करो रब के कृति को
ना तुम स्वयं इस शरीर को बर्बाद करो
प्यार होता है  रूह से  रूह का  रिश्ता
इस सच्चाई को दिल से अनुभव करो

प्यार करने वाले से प्यार का भाव कैसा हो, दो शेर में अर्ज़ किया है...

वक्त कोई हो तो ये बता दो
कि किस वक्त तुम्हें मैं याद नहीं करता
तेरे रहने से हम हमेशा मुस्कुराते,
ये सोचकर मेरा दिल है मुस्कुरा लेता

सचमुच अगर जान लो प्यार को
प्यार मारता नहीं,मगर जिलाता है
प्यार में संग अगर ना रह पाये भी
बिन संग रहे भी हर पल मुस्कुराता है

-बीरेन ☺

Thursday, March 30, 2017

दुःख का हल

जीवन में दुःख आते है, हम मनुष्य परेशान हो जाते, ...इसी भाव पर अर्ज है एक कविता ...

एक से एक तकलीफ है
कौन इनका निर्वाह करे
जीवन हो जाता कठिन
कौन इसका प्रवाह करे

साधना पड़ता अर्जुन  की  तरह
चीरना पड़ता नदी की तेज धारा
तपाना पड़ता शरीर के अंग-अंग
फिर बजती चैन  बंसी की धारा

कितने उलझ जाते सुलझकर
कितने ही राह में उलझा देते हैं
सारा दोष अपने सिर आ जाता
हर पल त्राहि त्राहि मच जाते हैं

कौन निकाले इस विपदा से
कौन सवांरे इस तकलीफ में
कौन उक्त करूँ निकलने का
कौन चीर दे इस चीरहरण में

मंदिर से नाता जुड़ने लगता
पत्थर का मूर्ति सुनने लगता
हे पालनहार हमें उबार करो
जीवन की नैया डूबने लगता

फिर बिजली कौंधती सुने गगन में
एक अनोखी तरंग तन में आ जाती
चलने लगता चप्पू दुःख की नदी में
धीरे धीरे से नाव किनारे लग जाती

मुस्कुराहट की लहर दौड़ती
मित्रगण को धन्यवाद करते
चैन की  बंशी बजने लगती
दुःख से  निवारण  हो जाते

सच में दुःख-विपदा सवंर जाते
बस व्यस्त रहें व्यवस्थित करते
हिम्मत ना हारे,रहे चलते चलते
जीवन के राह में,रहें आगे बढ़ते

-बीरेन 😊

Sunday, March 26, 2017

एक दूसरे की सहायता करे ... क्यों

क दूसरे की सहायता करे ... क्यों ...अर्ज़ है चन्द शेर...

हैं इस जहान में अकेले हमसब,मिल के दे दो साथ
थकान हमारी मिट जायगी,तेरे मुस्कुराहट के साथ

हैं हम सब रब के नूर,हर एक में है वही नूर
अज्ञान में आकर दूर हो जाते,ना जाओ दूर

दुनिया इसलिए नहीं बनी कि यह दुनिया युहीं बननी थी
दुनिया इसलिए बनी कि दुनिया रब के नूर से चलनी थी

कैसे समझे हम इस नूर को,क्या ये नूर बहुत विस्मयकारी है
नूर है बहुत सरल समझने में ,कोशिश करने पर भ्रमकारी है

देते रहो सहायता हर एक नूर को, जितना तक सम्भव हो सके
मिटाते रहो अंधकार अज्ञान का,थोड़ा भी यदि अज्ञान हट सके

-बीरेन 😊

भक्ति क्या है

भक्ति क्या है ...

भक्त लगाता भाव भगवन से
जोड़ता भाव इस भवसागर में
हे दीन दयाल भगवन मेरे
एक भाव जुड़ा है भगवन में

क्यों करते हम भाव की पूजा
भगवन के लिए भक्ति क्या जरूरी है
यह दुनिया उसकी हम उसके
क्या भगवन से भाव जताना जरुरी है

भले यह दुनिया उसकी,
पर हम ये दुनिया अपना बना लेते
भूलकर इस दुनिया में
अपना अलग दुनिया हम बसा लेते

यह धरती है यह दुनिया है
इस भाव में हम डूब जाते
नैया डगमगाती हम डरते
डर में जीवन  बीत जाते

ना डर मेरा, ना नैया मेरी
डगमगाती रहे यह दुनिया डर डर में
हे प्रियतम प्राण प्रभु मेरे
यह दुनिया मेरी नहीं,कह देता भक्त भक्ति में

भवसागर बनाकर भाव दिया
क्यों सागर से डरूँ भवसागर में
हे दिनदयाल प्रभु मेरे
अर्पित है सबकुछ मेरा तुझमें

-बीरेन

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