Friday, December 26, 2014

सर्दी की तपिस

मेरे लिखने की कला को कला न समझो 
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए 
तेरे रेशमी जुल्फों को लहराते हुए भी ना देखा
कमबख्त सर्दी ने टोपी तुमसे पहनवा दी है 

तेरे नयनों के नूर से तपिस मुझ तक पहुंची 
क्या ये नूर, तुझे गर्मी नहीं दे पा रहे हैं 
तेरे चेहरे पे खिलती ये मुस्कराहट की लहर 
बार-बार मुझे तेरी ओर बरबस धकेल रही है 

मेरे लिखने की कला को कला न समझो
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए...

ये जो तेरी मुस्कराहट मुझसे कह रही है 
कि खो जाऊँ खिलखिलाहट में हमेशा के लिए  
बाँध लूँ तुझे अपने बंधन में हरवक्त के लिए 
साँसों से गर्म रखूं तुझे सर्द से बचने के लिए

मेरे लिखने की कला को कला न समझो
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए...

ये जो तेरी आँखों की चमक आती है मुझतक 
कहती है खो जाऊँ इनमे सदा-सदा के लिए 
पा तो लेता हूँ तुझे रोज सपनों में अपने लिए 
कब पाउँगा इन आँखों में डूबना हमेशा के लिए 

मेरे लिखने की कला को कला न समझो
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए...

बचा के रखना अपने को इस सर्दी से 
भले किसी की गर्मी उधार भी लेनी पड़े 
अगर अहम में किसी को ना दो मौका 
पर मुझे तो दो मौका हमेशा के लिए  

मेरे लिखने की कला को कला न समझो
ये प्यार के बोल हैं जो निकलते हैं तेरे लिए...




अहम् - वहम्

तुम मुझे छूट दो 
मैं तुम्हें मुझसे छूटने नहीं दूंगा 
तुम मुझे छुटकारा दोगे
मैं जीवन से ही छुटकारा पा लूंगा

यह छूटना 
तुम्हें तो पच जायेगा
पर सचमुच 
मुझसे नहीं पचाया जाएगा 

तुम कहते 
मुझे अहम् भी है वहम् है

अहम् पर शेर बोलता हूँ- 
कब रहा मुझ में अहम्, ये तुम मुझे बता दो 
कितनी बार तेरे आँखों में झाँका,फिर भी कहते बता दो 

मांगता कुछ किसी से जब कोई समझता नहीं है 
तुम समझ के भी अनजान हो,फिर मांगू कैसे,ये बता दो 

वहम् पर  हकीकत बोलता हूँ - 
अगर मुझे वहम् होता, मैं सचमुच तुम्हें नहीं चाहता 
तुम तो पानी की तरह निश्छल हो, मैं कैसे तुम्हें नहीं चाहता

इतनी चाह है मुझे तेरे लिए, जितनी मुझे अपनी जिंदगी की नहीं
कैसे जी रहा हूँ मैं अपनी जिंदगी, सचमुच ये मुझे कुछ पता नहीं  

इस अहम् और वहम् से - "अ" और "व्" दोनों निकल गया है 
हम-दम बनने के लिए, दोनों शब्दों का  "हम" सिर्फ बच गया है  

Thursday, December 25, 2014

चलो अच्छा है

तुम्हें देखकर अच्छा लगा
चेहरे किताब पर
ऐसा लगा जैसे अब यह किताब है भरा-भरा
तुम छा गए किताब पर 
एक अलंकार की तरह
एक छंद की तरह 
आसमान में पतंग की तरह 
नदी में कमल की तरह 
समुद्र में तरंग की तरह 
रंग में लाल की तरह 
धूल में गुलाल की तरह 
चेहरे में आँख की तरह 
आँख में मृगनयनी की तरह
हम में तुम की तरह 
तुम में मैं की तरह 

चलो अच्छा है
तेरी ज़िन्दगी अब चलने लगी 
मौषम की तरह आने लगी 
गीत गुनगुनाने लगी 
फूल खिलने लगी 
बगिया चहकने लगी 
आँगन महकने लगी 
भौरें आने लगे 
और तू खिलखिलाने लगे.

चलो अच्छा है 
मेरे सिवा सब हैं तेरे साथ 
तुम्हें मेरी जरूरत नहीं
तुम्हें मेरी चाह नहीं 
जैसे पहले नहीं थी 
जैसे कभी नहीं थी.

चलो अच्छा है 
कुछ भी नहीं अच्छा है 
चलो अच्छा है तेरे लिए
कि मेरे लिए कुछ भी नहीं अच्छा है 
चलो अच्छा है 
चलो अच्छा है 

Sunday, December 21, 2014

कोई जब मुस्कुराता है

तेरा दुःख जानकार 
मैं दुखी हो गया 
तेरे दुःख के सामने 
मेरा दुःख भाग गया 

तेरे दुःख का निदान ढूंढा
मैं जोर-जोर हंसने लगा 
मैं अपने दुःख भूल जाऊं 
तेरा दुःख भी भागने लगा 

कोई जब मुस्कुराता है 
उसके पीछे कारण होता है 
वह कारण और कुछ नहीं 
संतोष का पराकाष्ठा होता है 

मैं ये पा लूँ, जब मन कहता है 
पूछ लेता हूँ अब अपने मन से
किसी को दुःख तो नहीं होता है 
किसी को मेरे इक्क्षा पाने से  

तब इक्क्षा पाना या ना पाना
यह प्रश्न दुःख  नहीं बनता है  
मन एकदम शांत हो जाता है
और  इक्क्षा ख़त्म हो जाता है  

फिर मैं मुस्कुराने लगता हूँ 
अपने दुःख पर हंसने लगता हूँ 
तेरे दुःख पर हंसने लगता हूँ 
पाने का विचार खोने लगता हूँ 

यह ज्ञान सचमुच आज ही आया
जब मैं अपने दुःख के कारण को 
तेरे दुःख से जोड़ा,तुझ से जोड़ा 
तेरे दुःख को निदान करने को 

तेरे दुःख का निदान ढूंढकर 
मैं जोर-जोर से हंसने लगा 
मेरा दुःख छोटा पड़ गया
दोनोँ का दुःख भागने लगा

जब कोई कुछ पाने को चाहता 
उसकी स्थिति नाजुक होती 
ऐसा कह सकते-उसकी स्थिति
कुएँ में रहने जैसे ही है होती

कैसे कोई कूआँ में रहकर 
पानी का उपयोग है कर सकता 
यही पानी कुएँ से बाहर रहकर
जब पानी लाता,बहुत स्वाद पाता

सच कहूँ, इक्क्षा की स्थिति भी 
कुएँ में रहने जैसे कुछ-कुछ होती
पाना चाहता अज्ञान में रहकर
सही में बड़ी दयनीय स्थिति होती 

तेरा दुःख जानकार 
मैं दुखी हो गया 
तेरे दुःख के सामने 
मेरा दुःख भाग गया 

तेरे दुःख का निदान ढूंढा
मैं जोर-जोर हंसने लगा 
मैं अपने दुःख भूल जाऊं 
तेरा दुःख भी भागने लगा 

मैं जोर-जोर से हंसने लगा 
बैठे-बैठे गुनगुनाने लगा 
तुझसे बातें करने लगा 
मन-ही-मन मुस्कुराने लगा 

Saturday, December 13, 2014

नज़रे तो मिलाओ मुझसे-क्यों नज़र झुकाये हुए हो

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो 

यूँ गुमसुम क्यों  हो  बैठे
दिल में आया पूछूं  हाल
नज़रें झुकाये क्या सोच रहे 
सच में हुआ मेरा दिल बेहाल

लालू चुनरिआ पहन के तुम  
यूँ क्यों शर्माए हुए हो
तेरी भोली सूरत बोले 
कुछ -कुछ घबराये हुए हो 

कितने बिंदास लगते थे तुम 
ठीक इससे पहले की तस्वीर में 
लगता था कुछ कर बैठोगे 
अपनी फोटो खिंचवाने में

फिर अचानक क्या हुआ तुझे 
अभी की ताज़ी-ताज़ी तस्वीर में
क्यों गुमसुम- गुमसुम बैठो हो 
गज़ब लगते- इस गदराये भेष में

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो

अब चुप हो गया हूँ मैं 
छुपकर तुमसे दूर होकर
जैसे कोशिश है छुपने की 
तुम अपने  भेष बदलकर

नहीं झेल सका दुरी तुमसे
दर्द से हो जाता था बेहाल
आशा करता कि तुम पूछोगे 
कैसा है मेरे दुश्मन का हाल   ;)

फिर भी तेरी सुगबुगाहट  नहीं 
ना ही खुली तेरी बंद खिड़की  
मैं ही सोचा दूर हो जाऊं
मौत दिखाने लगा था तिड़की

बस यही तो है मेरा हाल 
ना कोई दिशा,ना कोई चाल
इसमें तुम कुछ ऐसे दिखे  
कि दिल हुआ पूछूं क्या है हाल

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो

तुम्हे देखते ही हो जाता
सुरम्य सा मेरा सुना संसार 
अार-पार कुछ नज़र नहीं आता 
जुड़ जाता तुझसे तार

अब तो कम से कम तार जोड़ लो 
बेतार जगत के जुगाड़ जोड़ लो 
कुछ सुन लो, कुछ सुना लो 
अपनी मुस्कराहट में हंस लो

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो


जिंदगी के अंदाज़ ...

जिंदगी के अंदाज़ ...

वाह रे जिंदगी 
ना भरोसा रहते हुए भी,
पल-पल तो छोडो,
कितने पल गुजार लेते,
उम्र-दर-उम्र गुज़ार लेते
साल-दर-साल गुजार लेते :)

और उनके नखरे देखकर 
मौत को भी भगा देते
मुस्कान चेहरे पे ला देते
उनके इंतज़ार में,पल-पल जीला देते ;) 

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अर्ज़  किया  है..

समंदर को तो पता भी नहीं चलेगा 
कि कोई पत्थर फेका भी गया है 
हाँ, अगर मन-समंदर की बात है 
तो समझ में भी आती है 
पत्थर तो इसलिए फेका जाता है 
कि देखें कितने गहरे तक जाती है ;)
यही तो इश्क़ है,
कि पत्थर को पत्थर ना समझो 
उसे एक पैगाम समझो
कितनी गहराई तक गई 
यह पता लग जाती है 
और दिल-से-दिल की बात हो जाती है :) 
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कैसी प्यारी नींद है..

कितनी अनूठी नींद होती है
कितनी भोली नींद होती है 
बच्चों की नींद हो या बड़ों की
नींद सबकी - बच्चों सी होती है

प्यारी नींद, दुलारी नींद 
नींद में डूबी  सबकी नींद
शक्ति लाती फुर्ती लाती 

आपकी नींद सबकी नींद :)   
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Tuesday, December 9, 2014

लाल चुनरिया - एक प्रयास - भोजपुरी भाषा में

लाल चुनरिया - एक प्रयास- भोजपुरी भाषा में     
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लाल लाल होठवा पे
लाली रे चुनरिया 
गोरी -  सुघड़ लागे रे 
होsss - सुघड़ लागे रे 

गाल के डिंपल सिंपल नइखे 
मुखड़ा तोहार लाजवाब 
कौने हाल में बैठल बारू
गोरी - तोहार नहीं जवाब  

तन के जे बइठल बारु
फोटवा खिंचाई के
होsss  - सुन्दर लागे रे 
होsss - सुघड़ लागे रे 

पढ़ल-लिखल लागे तारु 
गोरी तू हो कमाल
खड़ा होके तू जे ठुमका लगइबू 
महफ़िल हो जाय मालामाल 

लाल लाल होठवा पे
लाली रे चुनरिया 
गोरी -  सुन्दर लागे रे 
होsss - सुघड़ लागे रे 

आ जाऊं - चल आ जाती हूँ

तुम्हे कब से बोल रहा हूँ
अंखियाँ मे झांक कर कह रहा हूँ
कि  मत दिमाग लगा हमारे प्यार मे
दिल से बात कर ले- दिल से कह रहा हूँ

जब तुम छुपकर
नकली बनकर
बहरूपिए भेष मे
हूमसे पुच्च्ती हो
कि आ जाऊं 
सचमुच आ जाऊं 
चल आ जाती हूँ

तब तेरी एक तस्वीर की मुद्रा
याद आ जाती है
जिसमे तुमने
आंखो मे झाँकते हुये
खिंचवाया है
जिसमे तुमने
अपने हसीन चहरे को
हाथ पे टिकाया है 
बाल खुले है
दिल के विचार
तेरे चमकते आंखो से
गुलाबी गालो से
हल्की डिंपल से
मुस्कुराते चेहरे से
ब्यान करती है
कि  आ जाऊं 
सचमुच आ जाऊं 
चल आ जाती हूँ

ये कौन  सी तारीख की तस्वीर है
क्या तुझे याद है
कि तुम उस दिन से
बोल रहे हो
कि आ जाऊं  
सचमुच आ जाऊं 
चल आ जाती हूँ
पर हकीकत  मे जब
मैं बात करना चाहता
तुझे सुनना चाहता
तो तुम ऐसे कतरा जाते
जैसे कभी पहचान ही ना हो
और मैं  बस
सोचता रह जाता
कि ये सपना है
या हक़ीक़त है
कि आ जाऊं 
सचमुच आ जाऊं 
चल आ जाती हूँ .

दूरी तो बस एक पर्दे की है
अब तुम इसे मीलों दूर कर रहे हो
तो ये तेरी बात है

"अर्रे आना, सचमुच मे आना
ये तो बहुत नसीब की बाते होंगे
कमसेकम अभी के पल तो जी ले दोस्ती के
आयेज की बाते हुंमिल के फैसला करेंगे"

खुशियाँ

कहने को तो कह दिया मैने
मनुष्य को खुशियों की राह 
खुद बनानी पार्टी है
जीने के लिये

पर वो खुशियाँ है क्या
कितने तरह की होती है
कैसे चुनी जाती है
कैसे लाइ जाती है
क्या क्या चाह होती है
सब तुझसे जुड़ गई है
और तेरे बिन
कोई भी ख़ुशी नहीं दिखती

जब भी कोई खुशी उड़ती आ जाती
तो यही देखता
तुम होते तो कैसे चहकते
तुम होते तो कैसे मुस्कुराते
तुम होते तो कैसे खिलखिलाते
तुम होते तो कैसे चमकते

और वो खुशी 
बिन भींगाए ही मुझे
समुद्र की लहर की तरह
उठकर शांत हो जाती

मेरे इन विचारों से
ऐसा नहीं समझना
कि मैं दुखी हूँ
बस खुशियों को 
पहचानने की समझ आ गई
यही समझ  काफी है
उस खुशी मे डूबना
डूबकर इतराना नहीं कर पाता
डूब ही जाऊं
इन खुशियों मे 
इसकी ज़रूरत नहीं महसूसता
बस मुस्कुराता
और तेरी मुस्कुराहट मे खो जाता.