Saturday, December 13, 2014

नज़रे तो मिलाओ मुझसे-क्यों नज़र झुकाये हुए हो

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो 

यूँ गुमसुम क्यों  हो  बैठे
दिल में आया पूछूं  हाल
नज़रें झुकाये क्या सोच रहे 
सच में हुआ मेरा दिल बेहाल

लालू चुनरिआ पहन के तुम  
यूँ क्यों शर्माए हुए हो
तेरी भोली सूरत बोले 
कुछ -कुछ घबराये हुए हो 

कितने बिंदास लगते थे तुम 
ठीक इससे पहले की तस्वीर में 
लगता था कुछ कर बैठोगे 
अपनी फोटो खिंचवाने में

फिर अचानक क्या हुआ तुझे 
अभी की ताज़ी-ताज़ी तस्वीर में
क्यों गुमसुम- गुमसुम बैठो हो 
गज़ब लगते- इस गदराये भेष में

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो

अब चुप हो गया हूँ मैं 
छुपकर तुमसे दूर होकर
जैसे कोशिश है छुपने की 
तुम अपने  भेष बदलकर

नहीं झेल सका दुरी तुमसे
दर्द से हो जाता था बेहाल
आशा करता कि तुम पूछोगे 
कैसा है मेरे दुश्मन का हाल   ;)

फिर भी तेरी सुगबुगाहट  नहीं 
ना ही खुली तेरी बंद खिड़की  
मैं ही सोचा दूर हो जाऊं
मौत दिखाने लगा था तिड़की

बस यही तो है मेरा हाल 
ना कोई दिशा,ना कोई चाल
इसमें तुम कुछ ऐसे दिखे  
कि दिल हुआ पूछूं क्या है हाल

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो

तुम्हे देखते ही हो जाता
सुरम्य सा मेरा सुना संसार 
अार-पार कुछ नज़र नहीं आता 
जुड़ जाता तुझसे तार

अब तो कम से कम तार जोड़ लो 
बेतार जगत के जुगाड़ जोड़ लो 
कुछ सुन लो, कुछ सुना लो 
अपनी मुस्कराहट में हंस लो

नज़रे तो मिलाओ मुझसे 
क्यों नज़र झुकाये हुए हो 
ये-दिलरूबा यूँ मुझसे  
क्यों नज़रे चुराए हुए हो


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