Tuesday, December 9, 2014

खुशियाँ

कहने को तो कह दिया मैने
मनुष्य को खुशियों की राह 
खुद बनानी पार्टी है
जीने के लिये

पर वो खुशियाँ है क्या
कितने तरह की होती है
कैसे चुनी जाती है
कैसे लाइ जाती है
क्या क्या चाह होती है
सब तुझसे जुड़ गई है
और तेरे बिन
कोई भी ख़ुशी नहीं दिखती

जब भी कोई खुशी उड़ती आ जाती
तो यही देखता
तुम होते तो कैसे चहकते
तुम होते तो कैसे मुस्कुराते
तुम होते तो कैसे खिलखिलाते
तुम होते तो कैसे चमकते

और वो खुशी 
बिन भींगाए ही मुझे
समुद्र की लहर की तरह
उठकर शांत हो जाती

मेरे इन विचारों से
ऐसा नहीं समझना
कि मैं दुखी हूँ
बस खुशियों को 
पहचानने की समझ आ गई
यही समझ  काफी है
उस खुशी मे डूबना
डूबकर इतराना नहीं कर पाता
डूब ही जाऊं
इन खुशियों मे 
इसकी ज़रूरत नहीं महसूसता
बस मुस्कुराता
और तेरी मुस्कुराहट मे खो जाता.

No comments:

Post a Comment