Thursday, November 27, 2014

कितना सकून मिलता है - एक ग़ज़ल

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर 
उतना सकून तुम्हे भी नहीं मिला होगा 
मुझसे दूर होकर 

बहुत दर्द हुआ था 
जब बोले - चले जाओ जिंदगी से
बहुत लड़ा था अंपने से, तुमसे, सबसे 
जिंदगी से, न जाने किस-किस से 

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर ....

जब से चाहत तेरी खत्म हुई
ख़त्म होगी सारी कहानी 
थोड़ी सी जिंदगी, थोड़ी रवानी 
कट गई तेरी मेरी कहानी 

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर ....

छुपना केवल मुझसे  तेरा 
अब होगी नहीं तुझे ज़रूरत 
लो जी लो तुम अपने जिद पर 
छुपा लिया मैं - अपनी सूरत 

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर ....

दर्द क्या है, पता नहीं 
दवा की भी कोई दुआ नहीं 
तड़पना क्या है-तड़पन क्या है 
इसकी किसी को हवा नहीं 

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर ....

ये कौन जाने, कैसे जाने 
कितना दर्द होता-तुमसे दूर होकर
ना तुम समझोगे,ना तेरी दुनिया 
कितना सकून मिलता-तुमसे प्यार होकर

कितना सकून मिलता है 
तुमसे दूर होकर 
कितना सकून मिलता है 
तुमसे प्यार होकर 



No comments:

Post a Comment