एक ग़ज़ल ....
चल आ तुझसे हिसाब करूँ
बहुत दिन से जवाब आया नहीं है
अपना खाता बही ठीक करूँ
बहुत दिन से बकाया आया नही है
तेरे संग संग थोड़ा हँस लूँ
वर्षों से तेरा हँसी सुना नहीं है
तेरे संग बैठकर मुस्कुरा लूँ
बहुत दिन से मुस्कुराया नहीं है
चल आ तुझसे ....
तेरे लहलहाती जीत की खुशी में
तेरा उमंग सामने से देखा नहीं है
कितने मासूम तुम दिखते हो
सदियों से नजदीक से देखा नहीं है
चल आ तुझसे ....
तुम्हारे चँचल शोख आँखे की
अरसे से शरारत देखा नहीं है
तेरे सुर्ख गुलाबी होठों पर
फैली नजाकत देखा नहीं है
चल आ तुझसे ....
कभी मान जा इशारों से भी
पता नहीं क्यों मानते नहीं हो
ऐसे तुम हमसे व्यवहार करते
जैसे तुम मुझे जानते नहीं हो
चल आ तुझसे ....
ये कैसे तुझे समझाऊँ कि
किस तुम याद आते नहीं हो
किस दिन में किस पल को
तुम हमें सताते नहीं हो
चल आ तुझसे ....
-बीरेन ☺
चल आ तुझसे हिसाब करूँ
बहुत दिन से जवाब आया नहीं है
अपना खाता बही ठीक करूँ
बहुत दिन से बकाया आया नही है
तेरे संग संग थोड़ा हँस लूँ
वर्षों से तेरा हँसी सुना नहीं है
तेरे संग बैठकर मुस्कुरा लूँ
बहुत दिन से मुस्कुराया नहीं है
चल आ तुझसे ....
तेरे लहलहाती जीत की खुशी में
तेरा उमंग सामने से देखा नहीं है
कितने मासूम तुम दिखते हो
सदियों से नजदीक से देखा नहीं है
चल आ तुझसे ....
तुम्हारे चँचल शोख आँखे की
अरसे से शरारत देखा नहीं है
तेरे सुर्ख गुलाबी होठों पर
फैली नजाकत देखा नहीं है
चल आ तुझसे ....
कभी मान जा इशारों से भी
पता नहीं क्यों मानते नहीं हो
ऐसे तुम हमसे व्यवहार करते
जैसे तुम मुझे जानते नहीं हो
चल आ तुझसे ....
ये कैसे तुझे समझाऊँ कि
किस तुम याद आते नहीं हो
किस दिन में किस पल को
तुम हमें सताते नहीं हो
चल आ तुझसे ....
-बीरेन ☺
No comments:
Post a Comment