Saturday, March 18, 2017

जिस्म का रूह

अर्ज़ हैं इस रूह और जिस्म के माया जाल पर.....

रूह ही है वह अनुपम जिस्म, जिसे मैं महसूसता हूँ
जिस्म से वह निकल कर किधर जाता, ये देखता हूँ

जिस्म को हम सब दफना देते रूह निकल जाने के बाद
जिस्म में रूह की कद्र नहीं करते,फिर रोते,जाने के बाद

क्या सही है,क्या गलत है,दुनिया में समझ नहीं पाता ये मानव
जब तक समझ आता,तब तक सब लूट लेता,समय का दानव

गोल गोल धरती घूमती फिर से उस बिंदु पर आकर
कहती-रिश्ता फिर पुनर्जीवित कर लो,ये पल पाकर

खोया पल पाकर भी व्यस्त रहते, पुनर्जीवित  नहीं करते
उधेर बुन में हम समय गवां देते,नए नए सपना सजा लेते

-बीरेन 😊


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