दो-दो चाँद -फिर भी मन उखड़ा उखड़ा
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जिन्दा तो हम थे पहले भी
जिन्दा हम रहेंगे आगे भी
वर्तमान में बस होते अज्ञानी
जिसमे घबराते रहते सभी
एक चाँद खूबसूरत है बहुत
दूजा चाँद भी आ जायेगा
पर मृगनयनी के दर्शन का
वो स्वर्णिम पल कब आएगा
जिसके दो नयन हैं चाँद से
मुखड़ा रहता दमकता हुआ
जब भी देखता या सोचता
बस महसूसता खोता हुआ
कितने ही तो चाँद हैं इस जगत में
धरती का चाँद है दिल का टुकड़ा
इसकी चमक भी फीकी दिखती
जब से रहने लगा मेरा चाँद उखड़ा
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जिन्दा तो हम थे पहले भी
जिन्दा हम रहेंगे आगे भी
वर्तमान में बस होते अज्ञानी
जिसमे घबराते रहते सभी
एक चाँद खूबसूरत है बहुत
दूजा चाँद भी आ जायेगा
पर मृगनयनी के दर्शन का
वो स्वर्णिम पल कब आएगा
जिसके दो नयन हैं चाँद से
मुखड़ा रहता दमकता हुआ
जब भी देखता या सोचता
बस महसूसता खोता हुआ
कितने ही तो चाँद हैं इस जगत में
धरती का चाँद है दिल का टुकड़ा
इसकी चमक भी फीकी दिखती
जब से रहने लगा मेरा चाँद उखड़ा

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