Monday, October 19, 2015

दो पंक्तियाँ अनुपम सा

दो पंक्तियाँ अनुपम सा
-------------------------

कितनी अच्छी भक्ति होती 
एक भक्त के लिए
कितना अच्छा प्रेम होता
एक प्रेमी के लिए
कितना अच्छा शब्द होता 
किसी गान के लिए
कितना अच्छा गान होता 
किसी संगीत के लिए
कितना अच्छा संगीत होता
उसमें खोने के लिए 
कितना अच्छा खोना होता 
उसे चाहने के लिए 
वह कितना अच्छा चाह होता
एक प्यासे की प्यास के लिए
कितना अच्छा प्यास होता
उस पानी के लिए 
कितना अच्छा पानी होता
उस चंचल बून्द के लिए
वह बून्द कितना अच्छा होता
टपकने से आवाज़ के लिए
उस आवाज़ की क्या सीमा होती
अनवरत चलते समय के लिए 
और अब समय है 
वो दो पंक्तियाँ जानने के लिए 

मेरी मज़दूरी का मुआवजा ना दो
लेकिन अपने से मुझे दुरी मत दो 

ये कितनी अच्छी भक्ति है
एक भक्त के लिए
ये कितना अच्छा प्रेम है 
एक प्रेमी के लिए
ये कितना अच्छा शब्द है 
किसी गान के लिए
ये कितना अच्छा गान है
किसी संगीत के लिए
ये कितना अच्छा संगीत है 
उसमें खोने के लिए 
ये कितना अच्छा खोना है 
उसे चाहने के लिए 
ये कितना अच्छा चाह है 
एक प्यासे की प्यास के लिए
ये कितना अच्छा प्यास है 
उस पानी के लिए 
ये कितना अच्छा पानी है 
उस चंचल बून्द के लिए
ये बून्द कितना अच्छा है
टपकने सी आवाज़ के लिए
उस आवाज़ की क्या सीमा है 
अनवरत चलते समय के लिए 
अब समय है 
ये दो पंक्तियाँ अपनाने के लिए 

कि मेरी मज़दूरी मत दो
लेकिन दुरी भी नहीं दो 

मेरी मज़दूरी का मुआवजा ना दो
लेकिन अपने से मुझे दुरी मत दो 

No comments:

Post a Comment