Monday, September 22, 2014

ज्ञान-अज्ञान

भगवान ने ही संसार बनाया 
अपने रूपों का विस्तार किया !

ज्ञान रहने पर संसार नहीं बधता    
ज्ञान आ जाने पर संसार में नहीं रमता 
संसार और भगवान एक ही लगता 
संसार में डुबकी नहीं लगा पाता
डुबकी लगाता भी तो ज्ञान में ही रहता  

ज्ञान के ना रहने पर संसार दिखता 
संसार का रंग दिखता 
भगवान दूसरा लगता
संसार में डुबकी लगाता 
संसार के दुःख में दुखी होता 
संसार के सुख में सुखी होता 

इस शरीर में आत्मा के साथ 
संसार के पंच-भूत भी समाहित होते हैं
इस आत्मा और पंच-भूत के कारण  
इस शरीर में दिन-रात की तरह 
ज्ञान और अज्ञान आते रहते हैं 

सोचा था, 
अज्ञान के समय "तुम" "मेरे" साथ होते 
और ज्ञान के समय "मैं" "तेरे" साथ होता 
पर "तुम" बात कहाँ-की-कहाँ ले गए 
इतनी छानबीन करके 
कोई थोड़े ही संसार में डुबकी लगाता 

कल भी तेरा इंतज़ार था 
आज भी तेरा इंतज़ार है 
कल भी तेरा इंतज़ार रहेगा 
"तुम" अनुपम हो 
कहता था -कहता हूँ -कहता रहेगा 




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