तुम भले ही पेशेवर थे
तुम भले ही पेशेवर रहे
तुम भले ही पेशेवर हो
तुम भले ही पेशेवर होगे
पर तुमसे पेशेवर
नहीं रहने को दिल करता
सोचता हूँ कि नहीं सोचूं
मैं भी पेशेवर बनूँ
पर नहीं बन पाता
और सोचने को विवश हो जाता हूँ
बिना कोशिश किये
बिना उलझन के
केवल सुलझन और सुलझन लगता
हर प्रश्न का जवाब पूछता
जैसे तुम कोई देवी-देवता हो
सारे प्रश्नों का जवाब तुम जानते हों
ऐसा सोच - बात करते हुए
कब खो जाता - समय काट जाता
रास्ता में गंतव्य से आगे बढ़ जाता
जब ध्यान आता
फिर अपने में हँसता
तुम तो पेशेवर सा जी ही रहे हो
मैं ही पेशेवर ना रह पा रहा हूँ .
तेरा कोई दोष नहीं है
दोष तो मेरा ही है
तब ही तो तुम सबके नज़दीक हो
और मेरे से दूर हो .
ये भी नहीं सोचता
कि तुम जानोगे - तो तुम्हे दुःख होगा
अच्छा नहीं लगेगा
इसलिए तो तुम्हे नहीं कहता
बस अनंत ब्लॉग के जाल में
लिखता-खोता-मरता-जीता-हँसता.
इतना भी नहीं सोचता
कि नहीं सोचना चाहिए
जब सोचता हूँ दुनिया की
प्रकृति की, कायनात की
दुनिया की, जहान की
कर्म की, भक्ति की
दुःख की, सुख की
परिवार की, देश की
इस सोचने में तुम कब घुस आते
पता ही नहीं चलता
और जब पता चलता
अपने पे हँसता - और हँसता
और हँसते हुए भी
बस तुम दीखते
वही मुस्कुराता - खिलखिलाता चेहरा
और दिन बीतता जाता.
अब ऐसा नहीं कि
तुम हँसना छोड़ देना
ऐसा नहीं कि
तुम खिलखिलाना छोड़ देना
हम-सब प्रकृति के रूप हैं
एक में दोष के कारण
कोई कार्य नहीं छोड़ते
जीवन नहीं छोड़ते
जीवन तो जीना ही है
इस शरीर के ख़त्म होने पर
फिर दूसरे शरीर तक
यह कर्म चलता रहेगा
अनंतकाल तक
चिर काल तक
मोक्ष तक.
दिखा तो नहीं सकता भविष्य
कोई भी नहीं दिखा सकता
अगर दिखा ही सकता
तो साथ चलने की बात
तुम पर क्यों छोड़ता
यही पे है विवशता.
हाँ- दिखा तो नहीं सकता भविष्य
पर इतना मुझे जरूर पता है
कि अगर साथ आ जाओ
तो भविष्य सुनहरा है
तुम्हारा तो पता नहीं सुनहरा
पर मेरा पता है कि सुनहरा होगा
और जब मेरा सुनहरा होगा
तो तुम्हारा सुनहरा कैसे नहीं होगा
जिससे कि सुनहरा हुआ है
जिस सूर्य से वस्तु प्रकाशित हुए
वह सूर्य भी तो चमकीला है.
एक बड़ी अच्छी पंक्ति दिखी-
लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं
अगर यह भी हम ही सोचेंगे
तो फिर लोग क्या सोचेंगे ! !
तुम भले ही पेशेवर रहे
तुम भले ही पेशेवर हो
तुम भले ही पेशेवर होगे
पर तुमसे पेशेवर
नहीं रहने को दिल करता
सोचता हूँ कि नहीं सोचूं
मैं भी पेशेवर बनूँ
पर नहीं बन पाता
और सोचने को विवश हो जाता हूँ
बिना कोशिश किये
बिना उलझन के
केवल सुलझन और सुलझन लगता
हर प्रश्न का जवाब पूछता
जैसे तुम कोई देवी-देवता हो
सारे प्रश्नों का जवाब तुम जानते हों
ऐसा सोच - बात करते हुए
कब खो जाता - समय काट जाता
रास्ता में गंतव्य से आगे बढ़ जाता
जब ध्यान आता
फिर अपने में हँसता
तुम तो पेशेवर सा जी ही रहे हो
मैं ही पेशेवर ना रह पा रहा हूँ .
तेरा कोई दोष नहीं है
दोष तो मेरा ही है
तब ही तो तुम सबके नज़दीक हो
और मेरे से दूर हो .
ये भी नहीं सोचता
कि तुम जानोगे - तो तुम्हे दुःख होगा
अच्छा नहीं लगेगा
इसलिए तो तुम्हे नहीं कहता
बस अनंत ब्लॉग के जाल में
लिखता-खोता-मरता-जीता-हँसता.
इतना भी नहीं सोचता
कि नहीं सोचना चाहिए
जब सोचता हूँ दुनिया की
प्रकृति की, कायनात की
दुनिया की, जहान की
कर्म की, भक्ति की
दुःख की, सुख की
परिवार की, देश की
इस सोचने में तुम कब घुस आते
पता ही नहीं चलता
और जब पता चलता
अपने पे हँसता - और हँसता
और हँसते हुए भी
बस तुम दीखते
वही मुस्कुराता - खिलखिलाता चेहरा
और दिन बीतता जाता.
अब ऐसा नहीं कि
तुम हँसना छोड़ देना
ऐसा नहीं कि
तुम खिलखिलाना छोड़ देना
हम-सब प्रकृति के रूप हैं
एक में दोष के कारण
कोई कार्य नहीं छोड़ते
जीवन नहीं छोड़ते
जीवन तो जीना ही है
इस शरीर के ख़त्म होने पर
फिर दूसरे शरीर तक
यह कर्म चलता रहेगा
अनंतकाल तक
चिर काल तक
मोक्ष तक.
दिखा तो नहीं सकता भविष्य
कोई भी नहीं दिखा सकता
अगर दिखा ही सकता
तो साथ चलने की बात
तुम पर क्यों छोड़ता
यही पे है विवशता.
हाँ- दिखा तो नहीं सकता भविष्य
पर इतना मुझे जरूर पता है
कि अगर साथ आ जाओ
तो भविष्य सुनहरा है
तुम्हारा तो पता नहीं सुनहरा
पर मेरा पता है कि सुनहरा होगा
और जब मेरा सुनहरा होगा
तो तुम्हारा सुनहरा कैसे नहीं होगा
जिससे कि सुनहरा हुआ है
जिस सूर्य से वस्तु प्रकाशित हुए
वह सूर्य भी तो चमकीला है.
एक बड़ी अच्छी पंक्ति दिखी-
लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं
अगर यह भी हम ही सोचेंगे
तो फिर लोग क्या सोचेंगे ! !
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