Tuesday, September 16, 2014

आज के रूप का आलम

देख के तेरे रूप का आलम 
मस्ती तैर रहा तेरे चेहरे में 
गाल गुलाब नयन शराबी
दमक रहे छुक-छुक में 

जुल्फें तेरी सजी-सवंरी सी
महक रही है क्षण-क्षण में 
दुपटे की अदायें ऐसी जैसे 
फूल खिले हों बगियन में 

स्वेत वस्त्र में सिमटी गोरी 
मादकता लाये पल-पल में
डिंपल आ रही मुस्कान से
दमके चमक अंग-अंग में 

शोखी दा छाई काया में
रंग भर रहा यहाँ मेरे मन में
छू रहा तेरे अंग-अंग को
तस्वीर लगा के दिल में 

दिल करता पी जाऊं तुझे
समां लूँ -शिवशंकर की तरह
छुपा लूँ तुझे सारी दुनिया से
बन के अर्धनारीश्वर की तरह 

क्यों हो दूर मुझसे गोरी
बहुत रहा मैं दूर तुझसे
मुझे प्यार है गोरी तुमसे
नहीं कह पाया कभी तुझसे

मुझे प्यार हो गया-इकरार हो गया
गा रहा हूँ - मैं यहाँ चहक-चहक के
रमैय्या वस्तावैय्या,रमैय्या वस्तावैय्या
मैंने दिल तुझको दिया -गाना गा के 

कहाँ हो तुम दूर पड़े अकेले 
लगा लो सुर मेरे साथ गा के
दे दो मुझे कहीं से भी संकेत 
गाएं हमदोनो दूरभाष लगा के 

ऐसे मिल जाओ भी मुझसे, जैसे 
दो-नदी मिलते कल-कल करके
नहीं भान रहता दोनों नदी को 
जैसे हों धारा एक नीलगगन के 

दिल होता-यही तस्वीर यहाँ लगा दूँ 
छांट के केवल तेरे लावण्य रूप के
बन जाने दे अब मुझे तेरा कवि 
लिख लेने दे कविता तेरे रूप के 





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