Tuesday, September 9, 2014

वो सपनों की शहजादी

वो सपनों की शहजादी 
कभी बाहर भी निकल के आया कर 
सुबह फिर आई थी सपने में 
नाच दिखा रही थी मचल मचल कर 

वो सपनों की शहजादी....

यह सपना कोई रात का नहीं था 
था सुबह सुबह का 
ठुमुक ठुमक कर बुलाया तूने
मैं राह पे खड़ा था तेरे घर का 

वो सपनों की शहजादी....

क्या मनमोहक नजारा था
रंग-बिरंगी परिधान था 
छुपते भी नहीं थे दिखते भी नहीं थे 
ऐसा ही कुछ परिधान था 

वो सपनों की शहजादी....

कई दिन से सुखा सरक रहा है 
दाहिना आँख भी फरक रहा है 
रह रह दिल खुश हो रहा है 
ऐसा कभी नहीं हुआ, दिल कह रहा है 

वो सपनों की शहजादी....

देख तेरे मधुर धड़कन से 
कैसे गीत फरक रहे हैं 
मौषम की रंगीनियों में 
मन में उमंग भर रहे हैं 

वो सपनों की शहजादी....

कहीं पढ़ा तेरा मनो-राग 
कि तेरा अँखियाँ भर रहा है 
फिर कैसे पहनते होगे लेंस 
यही कल से सोच रहा है   ;)

वो सपनों की शहजादी....

चल आज एक काम करते हैं 
दोनों एक साथ हेलो करते हैं 
साढ़े तीन बजे मुन्नी का गाना
हम दोनों मिल के गाते हैं 

वो सपनों की शहजादी....

इतला देना मुझे भी 
मिल के गाना गाने को 
भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण 
प्रियवर तुझे बुलाने को 

वो सपनों की शहजादी 
कभी बाहर भी निकल के आया कर 
सुबह फिर आई थी सपने में 
नाच दिखा रही थी मचल मचल कर 



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