Friday, August 22, 2014

मनरंगी नाव

देख के तेरा अंदाज़ 
मुझे लगा कि एक कविता लिख दूँ   ;)
तुम सुनो ना सुनो 
मौषम ने कहा - मैं गुनगुना दूँ  :)

ऐसा नहीं कहता मेरा ये दिल 

कि ऐसे ना तुम देखा करो 
इसी मृगनयनी निगाहों से 
हक़ीक़त में मुझे देखा करो 

तेरे नटखट अदा से   

माहौल भी घबड़ा गया 
बिना नदी के भी धारा में 
मनरंगी  नाव आ गया 

बलखाने लगी नाव रुक-रुक के 

हाँथ बंधे डगमगाई टूक-टूक के 
कि गोरी चली है युहीं मुस्कुराने 
कोई टोके नहीं उसे झुक झुक के 

मुस्कराहट है आई ऐसी 

कि सतरंगी फूल खिल उठे 
इस सुने चबूतरे पे भी 
नदी में तरंग बहक उठे 

मुस्कराहट की लहर ऐसी है छाई

कि गाल में गढ़े पड़ने लगे तुझे 
तरंग के हिचकोले से हाँथ के बंधन 
कहते है दृस्य,प्रीत सम्भालो मुझे 

देख के तेरा- ये देखने का अंदाज़ 

ले आया है मौषम में बहता बहार 
निश्छल धारा युहीं निकलती गई 
बिन बादल के भी आ गई फुहार 

दिल में था कि उनकी तस्वीर यहाँ लगाऊँ
नाव में था कि दिल सा उनको इसमें बैठाऊँ
पर बैठना तो है जैसे बहुत दूर की बात 
बात भी नहीं होती,रह गई बस कहने की बात 

बस - देख के अंदाज़ तेरा 
मुझे लगा कि एक कविता लिख दूँ   ;)
तुम सुनो ना सुनो 
मुझे लगा कि मैं गुनगुना दूँ   :) 








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