एक भक्ति-ग़ज़ल का रूपांतरण मृगनयनी के अंदाज़ में
इतना तो करना मृगनयनी
जब प्राण तन से निकले
नयनों में काजल लगी हो
बलखाती बाल बिखड़ी हो
मुख पे गुलाबी छवि हो
सोलह श्रृंगार से सजी हो
पीताम्बरी परिधान लिपटी हो
कंचुकी में दुपटा हो
तेरी चाल मेरे तरफ हो
तब प्राण तन से निकले
मृगनयनी मन-मोहिनी
चांदनी-चाँद-चकोरी
बसंती सा सावन रूख हो
सागर का वो तट हो
बदली सी घटा हो
हलकी हलकी हवा हो
रिमझिम की फुहार हो
तू मेरे निकट हो
तब प्राण तन से निकले
मुख में तेरा नाम बसा हो
मौषम भी सुधरा हो
आत्मभाव से प्रेरित हो
मेरा दर्पण-आत्मा खड़ा हो
दोनों लूटने को तज्य हो
हम लुटाने को सज्य हो
लूटने लुटाने कोई भाव ना हो
प्रभु का हम-दोनों पे आशीर्वाद हो
तब प्राण तन से निकले

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