कितनी अच्छी छुटियाँ थी
आ जाते हम हिल-मिल के
वो दूर गगन के तारे
बुला भी लेते घुल-मिल के
देखा है समंदर उनके आँखों में
तूफ़ान को सीने में समेटे हुए
कभी फूल बनकर तरंग लुटाते
हकीकत में मुँह मोड़ते हुए
क्या करुँ मैं, मैं तो मदहोश हूँ
कबसे आगोस समेटे हुए
वर्ष-दर-वर्ष युहीं बीत गए
आँख-मिचौली खेलते हुए
कहाँ जाऊँ मैं मिलने उनसे
वो आकर भी युहीं चले गए
कल भी भेजा था अभिवादन
पर उसका भी नहीं जवाब दिए
रहे मृगनयनी तू खुश हमेशा यूँही
हम-सबका जीवन चलता रहेगा
सपना कभी अपना,अपना कभी सपना
जीवन में युहीं रोज आता रहेगा
अब छोड़ भी दे जिद्द अपना
कितने पत्थर दिल हो गए हो
इतने दिन साथ रहे फिर भी
तंग-दिल जैसे बैठे हुए हो
पता नहीं क्यों, तुझसे दूर नहीं रहा जाता
कितना भी मैं दूर हूँ,पर महसूस नहीं होता
ऐसा लगता-सारे कायनात में बस तुम हो
और हम-दो अलग हैं,सच नहीं लगता
आ जाते हम हिल-मिल के
वो दूर गगन के तारे
बुला भी लेते घुल-मिल के
देखा है समंदर उनके आँखों में
तूफ़ान को सीने में समेटे हुए
कभी फूल बनकर तरंग लुटाते
हकीकत में मुँह मोड़ते हुए
क्या करुँ मैं, मैं तो मदहोश हूँ
कबसे आगोस समेटे हुए
वर्ष-दर-वर्ष युहीं बीत गए
आँख-मिचौली खेलते हुए
कहाँ जाऊँ मैं मिलने उनसे
वो आकर भी युहीं चले गए
कल भी भेजा था अभिवादन
पर उसका भी नहीं जवाब दिए
रहे मृगनयनी तू खुश हमेशा यूँही
हम-सबका जीवन चलता रहेगा
सपना कभी अपना,अपना कभी सपना
जीवन में युहीं रोज आता रहेगा
अब छोड़ भी दे जिद्द अपना
कितने पत्थर दिल हो गए हो
इतने दिन साथ रहे फिर भी
तंग-दिल जैसे बैठे हुए हो
पता नहीं क्यों, तुझसे दूर नहीं रहा जाता
कितना भी मैं दूर हूँ,पर महसूस नहीं होता
ऐसा लगता-सारे कायनात में बस तुम हो
और हम-दो अलग हैं,सच नहीं लगता

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