जिन्दा रहने को सांस की ज़रुरत होती
तुम बन गए हो सांस, स्वतः नहीं ले पाता हूँ
सांस लेने में अटक रहा था अभी
जिन्दा रहने को तुम्हें बुला रहा हूँ
तुम कहते, मेरे गुजरते ही
मुर्दा भी ज़िंदा हो जाते
और ज़िंदा को ही मार रहे हो
कैसे तुम ये मेरे साथ ही कर पाते
नफरत अगर तुझसे रहता
यह कैसे तुम आंक लिए हो तुम
तुम तो दिल में बसे हो,मृगनयनी
पता ही नहीं चलता - दिल है या तुम
सांस मिली दो मीठी शब्द सुन के
शैली तो तेरा बदल गया है
लग रहा था भगवन हो या देवी
जो मेरा सांस वापस दे रहा है
हाँ - हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
तेरा खुराफात सब समझ गया हूँ
पर इससे मैं नहीं भटकने वाला हूँ
तुम्हें अच्छी तरह जान गया हूँ
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
तुम कहीं गलत भी अगर रहे
तब भी तुम शुद्ध आत्म-तत्व ही रहोगे
अपने ही तरह तुम्हें भी जान गया हूँ
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
आध्यात्म मैंने जाना है
अध्यन क्या है - यह पहचाना है
तभी तो चुपचाप सा तुम्हें देखता रहा हूँ
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
मैं इंतज़ार में था कि तुम मुझसे पूछोगे
मेरे सामने आकर, आँखों में झांककर
ऐसा क्या है - जो इस तरह देखते मुझे
पर तुमने आध्यात्म जाना नहीं था
तुमने अध्यन पहचाना नहीं था
कहाँ का बात कहाँ ले गए
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
मैंने भी तुम्हें समझाने की कोशिश नहीं किया
क्योंकि आध्यात्म दिमाग से नहीं
दिल से सीखा जाता - और तुम दिमाग में थे
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
अपना एक चेहरा छुपा के तूने
कितने पन्ने जोड़ दिए चहेरे किताब पे
कितने को भरमा रहे,मुझे भी भरमा के
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
आध्यात्म जो मैंने सीखी
वह तुम्हें सोचते ही ख़त्म हो जाती (हा ..हा .)
तुम कहोगे-कैसे समझाओगे मुझे
जब तुम ही भूल जाते हो (हा ..हा .)
तुम हँसोगे हम पे - हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
तुम कहोगे-झूट मुठ का
भगवन भगवन कह रहे हो
अपने भी भ्रम में हो
मेरा समय भी बिगाड़ रहे हो
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
सचमुच कुछ ऐसा ही है
अब तुम ही कुछ भक्ति सीखा दो
जो सिखाना है अब तुम ही सीखा दो :)
सचमुच .......
इस धरा पे बिलकुल तन्हा लगता
अब तुम ही पथप्रदर्शक बनो
तन्हा सा जी रहा हूँ, अब जीला दो
हे प्रभु- अब बस भी करो
अब और न भटकाओ मुझे
मैं अब थक गया हूँ
मैं अपने में भटक रहा हूँ
संभाल लो मुझे सचमुच
जैसे रखोगे रह लूंगा
मैं अपने से अब थक गया हूँ
तुम बन गए हो सांस, स्वतः नहीं ले पाता हूँ
सांस लेने में अटक रहा था अभी
जिन्दा रहने को तुम्हें बुला रहा हूँ
तुम कहते, मेरे गुजरते ही
मुर्दा भी ज़िंदा हो जाते
और ज़िंदा को ही मार रहे हो
कैसे तुम ये मेरे साथ ही कर पाते
नफरत अगर तुझसे रहता
यह कैसे तुम आंक लिए हो तुम
तुम तो दिल में बसे हो,मृगनयनी
पता ही नहीं चलता - दिल है या तुम
सांस मिली दो मीठी शब्द सुन के
शैली तो तेरा बदल गया है
लग रहा था भगवन हो या देवी
जो मेरा सांस वापस दे रहा है
हाँ - हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
तेरा खुराफात सब समझ गया हूँ
पर इससे मैं नहीं भटकने वाला हूँ
तुम्हें अच्छी तरह जान गया हूँ
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
तुम कहीं गलत भी अगर रहे
तब भी तुम शुद्ध आत्म-तत्व ही रहोगे
अपने ही तरह तुम्हें भी जान गया हूँ
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
आध्यात्म मैंने जाना है
अध्यन क्या है - यह पहचाना है
तभी तो चुपचाप सा तुम्हें देखता रहा हूँ
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
मैं इंतज़ार में था कि तुम मुझसे पूछोगे
मेरे सामने आकर, आँखों में झांककर
ऐसा क्या है - जो इस तरह देखते मुझे
पर तुमने आध्यात्म जाना नहीं था
तुमने अध्यन पहचाना नहीं था
कहाँ का बात कहाँ ले गए
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
मैंने भी तुम्हें समझाने की कोशिश नहीं किया
क्योंकि आध्यात्म दिमाग से नहीं
दिल से सीखा जाता - और तुम दिमाग में थे
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
अपना एक चेहरा छुपा के तूने
कितने पन्ने जोड़ दिए चहेरे किताब पे
कितने को भरमा रहे,मुझे भी भरमा के
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
आध्यात्म जो मैंने सीखी
वह तुम्हें सोचते ही ख़त्म हो जाती (हा ..हा .)
तुम कहोगे-कैसे समझाओगे मुझे
जब तुम ही भूल जाते हो (हा ..हा .)
तुम हँसोगे हम पे - हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
तुम कहोगे-झूट मुठ का
भगवन भगवन कह रहे हो
अपने भी भ्रम में हो
मेरा समय भी बिगाड़ रहे हो
हा..हा ..हा ..हा ..हा ..
सचमुच कुछ ऐसा ही है
अब तुम ही कुछ भक्ति सीखा दो
जो सिखाना है अब तुम ही सीखा दो :)
सचमुच .......
इस धरा पे बिलकुल तन्हा लगता
अब तुम ही पथप्रदर्शक बनो
तन्हा सा जी रहा हूँ, अब जीला दो
हे प्रभु- अब बस भी करो
अब और न भटकाओ मुझे
मैं अब थक गया हूँ
मैं अपने में भटक रहा हूँ
संभाल लो मुझे सचमुच
जैसे रखोगे रह लूंगा
मैं अपने से अब थक गया हूँ
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