इतना कैसे पूछ लेते सवाल
मेरे आँखों में झांककर
मैं तो देखते ही खो जाता हूँ
तेरे आँखों में झांककर
देख-एक झटका लगेगा "हमें"
दोनों को मुखातिब होने में
फिर तस्सली से बात होगी
सभी जवाब मिल जायेंगे उत्तर में
एक बात यह है,ये तू जान ले
क्यों करता मैं तुझसे प्यार
इसका नहीं कोई मेरे पास जवाब
देखा था पहली बार-हो गया था प्यार
शुरू में मैं, दुनिया के रंगों में चला
बहुत समझाया अपने को,पर हारता गया
जिसके लिए मैं था इंतज़ार में जनम से
उसे कैसे मैं अनजान बन के हूँ दूर किया
ना दिखा उम्र, ना दिखा मेरी स्थिति
मुझे तो बस मिल गई मेरी पार्वती
शंकर का भी बहुत उम्र हुआ था
जब उन्हें मिली थी उनकी पार्वती
उम्र की बात अगर तुझे खलता है
लो आज मैं ये शरीर छोड़ता हूँ
तब जो "मैं" लूंगा अगला जन्म
तब क्या मानोगे मुझे सनम
मैं समझता हूँ अब जीवन क्या है
यह दुनिया बस प्रभु का माया-खेल है
आत्मा-का-आत्मा से जबतक नहीं मिलता
तबतक जीवन युहीं बस खेलता रहता है
इस क़ायनात को सरफिरे शरीरों ने
बाँट दिया अंगिनत सरहदों में
और अँधे बन के धृतराष्ट्र-गंधारी सा
घुलते रहते दुनिया के उलझन में
देख कहा से कहा तक बात चली
प्यार-से-दर्शन के तरफ मुड़ गए
मैं सचमुच कहता वो मृगनयनी
तू है कोई अवतार-जो मेरे से जुड़ गए
तुझे यह देख क्यों नहीं लगता
तू हरवक्त होते हो-हरसमय सोचता
जैसे ही तुझे देखता या सुनता
बस हाथ लिखता जाता-कहता जाता
मेरे आँखों में झांककर
मैं तो देखते ही खो जाता हूँ
तेरे आँखों में झांककर
देख-एक झटका लगेगा "हमें"
दोनों को मुखातिब होने में
फिर तस्सली से बात होगी
सभी जवाब मिल जायेंगे उत्तर में
एक बात यह है,ये तू जान ले
क्यों करता मैं तुझसे प्यार
इसका नहीं कोई मेरे पास जवाब
देखा था पहली बार-हो गया था प्यार
शुरू में मैं, दुनिया के रंगों में चला
बहुत समझाया अपने को,पर हारता गया
जिसके लिए मैं था इंतज़ार में जनम से
उसे कैसे मैं अनजान बन के हूँ दूर किया
ना दिखा उम्र, ना दिखा मेरी स्थिति
मुझे तो बस मिल गई मेरी पार्वती
शंकर का भी बहुत उम्र हुआ था
जब उन्हें मिली थी उनकी पार्वती
उम्र की बात अगर तुझे खलता है
लो आज मैं ये शरीर छोड़ता हूँ
तब जो "मैं" लूंगा अगला जन्म
तब क्या मानोगे मुझे सनम
मैं समझता हूँ अब जीवन क्या है
यह दुनिया बस प्रभु का माया-खेल है
आत्मा-का-आत्मा से जबतक नहीं मिलता
तबतक जीवन युहीं बस खेलता रहता है
इस क़ायनात को सरफिरे शरीरों ने
बाँट दिया अंगिनत सरहदों में
और अँधे बन के धृतराष्ट्र-गंधारी सा
घुलते रहते दुनिया के उलझन में
देख कहा से कहा तक बात चली
प्यार-से-दर्शन के तरफ मुड़ गए
मैं सचमुच कहता वो मृगनयनी
तू है कोई अवतार-जो मेरे से जुड़ गए
तुझे यह देख क्यों नहीं लगता
तू हरवक्त होते हो-हरसमय सोचता
जैसे ही तुझे देखता या सुनता
बस हाथ लिखता जाता-कहता जाता

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