युवा में ललक होती थी
कविता लिखने की
कैसे लिखूँ बंदिशें
कैसे लिखूँ कविता.
चाँद को देखना पड़ता था
निहारना पड़ता था
घंटों सोचता रहता
तब कहीं कुछ शब्द आते
तब कहीं कुछ बोल आते
तब कहीं कुछ पंक्तींयाँ बनती
तब कहीं कविता बनती.
आज का आलम यह है-
चाँद खुद उतर जाता
चाहे कितनी भी बदली लगी हो
चाहे अमावस की रात हो
बिना बात के बात हो
जैसे ही उनकी याद आती
चाँद खुद-ब-खुद उतर जाता
यादों के रास्ते - लिखने के वास्ते
ख्यालों के रास्ते - दिल के वास्ते
खुद-ब-खुद बोल निकल पड़ते
अधरो से शब्द फूट पड़ते
सबनम सी फुहार आ जाती
बेमौषम बरसात आ जाती
आँखों से नूर टपकती
मृगनयनी की याद आ जाती
ठुमुक-ठुमुक चाल की आवाज़ आ जाती
बलखाती तरन्नुम की अल्फ़ाज़ आ जाती
दिल कुछ कहने को विवश हो जाता
मन कुछ से कुछ करने को बहक जाता
और ठहर जाता उनपर
उनके मृगनयनी आँखों में
उनसे टपकती-चमकती नूर में
हलकी-हलकी मुस्कराहट में
बिखड़े-बिखड़े बालो में
सुर्ख-गुलाबी गालों में
कभी डाल-डाल, कभी पात-पात
कभी उमड़-घुमड़,कभी बे-बाक-बात
चलती हुई चालों में
उमड़ती-घुमड़ती बहारो में
सदा-सदा के लिए खो जाने को
हमेशा के लिए डूब जाने को .
कविता लिखने की
कैसे लिखूँ बंदिशें
कैसे लिखूँ कविता.
चाँद को देखना पड़ता था
निहारना पड़ता था
घंटों सोचता रहता
तब कहीं कुछ शब्द आते
तब कहीं कुछ बोल आते
तब कहीं कुछ पंक्तींयाँ बनती
तब कहीं कविता बनती.
आज का आलम यह है-
चाँद खुद उतर जाता
चाहे कितनी भी बदली लगी हो
चाहे अमावस की रात हो
बिना बात के बात हो
जैसे ही उनकी याद आती
चाँद खुद-ब-खुद उतर जाता
यादों के रास्ते - लिखने के वास्ते
ख्यालों के रास्ते - दिल के वास्ते
खुद-ब-खुद बोल निकल पड़ते
अधरो से शब्द फूट पड़ते
सबनम सी फुहार आ जाती
बेमौषम बरसात आ जाती
आँखों से नूर टपकती
मृगनयनी की याद आ जाती
ठुमुक-ठुमुक चाल की आवाज़ आ जाती
बलखाती तरन्नुम की अल्फ़ाज़ आ जाती
दिल कुछ कहने को विवश हो जाता
मन कुछ से कुछ करने को बहक जाता
और ठहर जाता उनपर
उनके मृगनयनी आँखों में
उनसे टपकती-चमकती नूर में
हलकी-हलकी मुस्कराहट में
बिखड़े-बिखड़े बालो में
सुर्ख-गुलाबी गालों में
कभी डाल-डाल, कभी पात-पात
कभी उमड़-घुमड़,कभी बे-बाक-बात
चलती हुई चालों में
उमड़ती-घुमड़ती बहारो में
सदा-सदा के लिए खो जाने को
हमेशा के लिए डूब जाने को .

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