वो मृगनयनी दिल-मोहिनी
ऐसे टकटकी लगा के ना देखा कर
तुझसे प्यार हो जायेगा मुझे
ऐसे बाल बिखड़ा के ना बैठा कर
तूने इज़ाज़त ही नहीं दी प्यार करने की
वरना यह रूप देख आ गया होता भागकर
और तोड़ देता तेरी टकटकी अंदाज़ को
तेरे आँखों में झांकते अपनी चुटकी बजाकर
और चुम लेता इन आँखों को
तेरे झपकते हुए प्यारे पलकों पर
और उड़ा देता रेशमी बालों को
लहराते हुए सुर्ख गुलाबी चेहरे पर
कई बार तुझसे जानना चाहा
देखने के अंदाज़ पे पूछना चाहा
तेरा देखने के अंदाज़
है बड़ा निराला
है बड़ा अजूबा
है बड़ा मनमोहक
है बहुत अलग सा
कि देखते वक़्त क्या सोचते हो
कि देखते हुए कैसे देखते हो
ऐसा लगता है-दिल से देखते हो
ऐसा लगता है-तेरे नज़र जिस पे भी जाते
वो सारे चीज़ें दिखने को इंतज़ार में हो
दिखाने को तत्पर हो
और तुम देखते हुए उन्हें
दर्शन दे रहे हो
अपने अनुपम मृगनयनी नयनों से.
तेरे मृगनयनी आँखें ऐसे हैं
मानो जीवंत कर दे मृत को
प्यास मिटा दे प्यासे को
अनुराग जगा दे कातिल को
तेरे देखने से निकलती नूर
चार-चाँद लगाती बनती हूर
तुम हो वो खूबसूरत मलिक्का
लगते पानी भरते हैं सारे तारिका
तुम हो वो अनमोल नायाब अमृत
कि मरता रहूँगा अगर कभी
तो जी उठूंगा फिर से उसी वक़्त सही
अगर साथ आ गए मेरे नसीब से
तो यह शरीर से नहीं जाऊंगा कभी
और तू जब अपने मन से शरीर छोड़ना चाहोगे
जायेंगे तब "हम" साथ-साथ सही
तू मृगनयनी चित-चोरनी
क्यों मुझसे दूर रहते हो
तेरे सकल-ज्ञानी मधुर-वाणी से
मेरे कान सुनने को आतुर हो
दुःख होता अपने पे बहुत मुझे
तू जितनी नायाब हो, उतना मैं नहीं
तभी तो तेरे गीत गाता अकेला
पता नहीं-तू सुनते भी या नहीं
मुझे अबतक नहीं पता
तुम मुझे भाव देते भी हो या नहीं
चेहरे किताब की भाषाएँ
भरमाती है पर रास्ता दिखाती नहीं
दिल में बहुत बार आता
कि तुम्हें मना लू जाकर वही
पर दिल मायूस हो जाता-कहता
उन्हें मेरी ज़रूरत नहीं
उन्हें ज़रुरत होती
तो वो दूर भेजते ही कभी
उन्हें अगर प्यार होता
तो वर्ष-दर-वर्ष बीते-बात क्या नहीं करते कभी
उनके दिल में मेरा जगह होता
तो बंद कपट क्या नहीं खोलते कभी
मेरे लिए कोई भावना होती
तो वो क्या नहीं जताते कभी
घंटो वो किस - किस से बात करते
क्या मुझसे बात नहीं करते कभी
वो अनमोल नायाब मृगनयनी परी
प्यार सच्ची क्या होता- मुझे पता है
दिल क्या होता- मुझे पता है
रूह क्या होता- मुझे पता है
जीवन क्या होता - मुझे पता है
जीना क्या होता - मुझे पता है
तेरे बिन जीना क्या होता - मुझे पता है
तेरे संग क्या होगा जीना - मुझे पता है
और तेरा क्या जीवन होगा मेरे साथ - वह भी पता है.
कभी "पल-भर" के गाने की तरह
बंद खिड़की को खोल तो दो
गाना गुनगुना तो दो
मुझे कुsss करके बता तो दो
वरना अबतक यही समझ रहा
लिखने के लिए किताब लिख रहा
अपने मन को बहला रहा
रोज सपने में तुझे बुला रहा
क्या तुम नहीं सोचते कि
हरवक्त तुझे सोचता हूँ मैं
तभी तो तुझे देखते ही
कुछ कहने को टूट पड़ता हूँ मैं
कितना भी लिखूं - कम लगता है
तेरे संग गीत गुनगुनाऊँ-हसीन लगता है
तुम गाओगे - सपना लगता है
तुझ में मैं लय हो जाऊं - अपना लगता है
ऐसे टकटकी लगा के ना देखा कर
तुझसे प्यार हो जायेगा मुझे
ऐसे बाल बिखड़ा के ना बैठा कर
तूने इज़ाज़त ही नहीं दी प्यार करने की
वरना यह रूप देख आ गया होता भागकर
और तोड़ देता तेरी टकटकी अंदाज़ को
तेरे आँखों में झांकते अपनी चुटकी बजाकर
और चुम लेता इन आँखों को
तेरे झपकते हुए प्यारे पलकों पर
और उड़ा देता रेशमी बालों को
लहराते हुए सुर्ख गुलाबी चेहरे पर
कई बार तुझसे जानना चाहा
देखने के अंदाज़ पे पूछना चाहा
तेरा देखने के अंदाज़
है बड़ा निराला
है बड़ा अजूबा
है बड़ा मनमोहक
है बहुत अलग सा
कि देखते वक़्त क्या सोचते हो
कि देखते हुए कैसे देखते हो
ऐसा लगता है-दिल से देखते हो
ऐसा लगता है-तेरे नज़र जिस पे भी जाते
वो सारे चीज़ें दिखने को इंतज़ार में हो
दिखाने को तत्पर हो
और तुम देखते हुए उन्हें
दर्शन दे रहे हो
अपने अनुपम मृगनयनी नयनों से.
तेरे मृगनयनी आँखें ऐसे हैं
मानो जीवंत कर दे मृत को
प्यास मिटा दे प्यासे को
अनुराग जगा दे कातिल को
तेरे देखने से निकलती नूर
चार-चाँद लगाती बनती हूर
तुम हो वो खूबसूरत मलिक्का
लगते पानी भरते हैं सारे तारिका
तुम हो वो अनमोल नायाब अमृत
कि मरता रहूँगा अगर कभी
तो जी उठूंगा फिर से उसी वक़्त सही
अगर साथ आ गए मेरे नसीब से
तो यह शरीर से नहीं जाऊंगा कभी
और तू जब अपने मन से शरीर छोड़ना चाहोगे
जायेंगे तब "हम" साथ-साथ सही
तू मृगनयनी चित-चोरनी
क्यों मुझसे दूर रहते हो
तेरे सकल-ज्ञानी मधुर-वाणी से
मेरे कान सुनने को आतुर हो
दुःख होता अपने पे बहुत मुझे
तू जितनी नायाब हो, उतना मैं नहीं
तभी तो तेरे गीत गाता अकेला
पता नहीं-तू सुनते भी या नहीं
मुझे अबतक नहीं पता
तुम मुझे भाव देते भी हो या नहीं
चेहरे किताब की भाषाएँ
भरमाती है पर रास्ता दिखाती नहीं
दिल में बहुत बार आता
कि तुम्हें मना लू जाकर वही
पर दिल मायूस हो जाता-कहता
उन्हें मेरी ज़रूरत नहीं
उन्हें ज़रुरत होती
तो वो दूर भेजते ही कभी
उन्हें अगर प्यार होता
तो वर्ष-दर-वर्ष बीते-बात क्या नहीं करते कभी
उनके दिल में मेरा जगह होता
तो बंद कपट क्या नहीं खोलते कभी
मेरे लिए कोई भावना होती
तो वो क्या नहीं जताते कभी
घंटो वो किस - किस से बात करते
क्या मुझसे बात नहीं करते कभी
वो अनमोल नायाब मृगनयनी परी
प्यार सच्ची क्या होता- मुझे पता है
दिल क्या होता- मुझे पता है
रूह क्या होता- मुझे पता है
जीवन क्या होता - मुझे पता है
जीना क्या होता - मुझे पता है
तेरे बिन जीना क्या होता - मुझे पता है
तेरे संग क्या होगा जीना - मुझे पता है
और तेरा क्या जीवन होगा मेरे साथ - वह भी पता है.
कभी "पल-भर" के गाने की तरह
बंद खिड़की को खोल तो दो
गाना गुनगुना तो दो
मुझे कुsss करके बता तो दो
वरना अबतक यही समझ रहा
लिखने के लिए किताब लिख रहा
अपने मन को बहला रहा
रोज सपने में तुझे बुला रहा
क्या तुम नहीं सोचते कि
हरवक्त तुझे सोचता हूँ मैं
तभी तो तुझे देखते ही
कुछ कहने को टूट पड़ता हूँ मैं
कितना भी लिखूं - कम लगता है
तेरे संग गीत गुनगुनाऊँ-हसीन लगता है
तुम गाओगे - सपना लगता है
तुझ में मैं लय हो जाऊं - अपना लगता है

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