ग़ुलाम अली का ग़ज़ल पे आधारित .. अपनी धुन में रहता हूँ ...
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में खोया रहता हूँ
तेरे याद में जीता मरता हूँ
मैं भी तुझ संग जीता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में जीता रहता हूँ
तू रहते कहीं खोये
मैं रहता तुझमे खोये
तुझे याद नहीं मेरी
मैं तुझमे में खोता रहता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में खोता रहता हूँ
तू रात-भर न जाने
किस-किस से बातें करते हों
मुझसे करने से कतराते
मैं बस याद में मुस्कुरता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में मुस्कुराता हूँ
मौत को भी बोल दिया है
छूना नहीं मुझे तेरे आने तक
और तुझे जल्दी है मेरे मरने की
देखो मैं कैसे जिन्दा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे आने तक तो जिन्दा हूँ
कितना भी गुस्सा करता हूँ
फिर भी दूर नहीं होता हूँ
रातों में- सपनो में
यादों में जीता जिलाता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में जीता रहता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में खोया रहता हूँ
तेरे याद में जीता मरता हूँ
मैं भी तुझ संग जीता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में जीता रहता हूँ
तू रहते कहीं खोये
मैं रहता तुझमे खोये
तुझे याद नहीं मेरी
मैं तुझमे में खोता रहता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में खोता रहता हूँ
तू रात-भर न जाने
किस-किस से बातें करते हों
मुझसे करने से कतराते
मैं बस याद में मुस्कुरता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में मुस्कुराता हूँ
मौत को भी बोल दिया है
छूना नहीं मुझे तेरे आने तक
और तुझे जल्दी है मेरे मरने की
देखो मैं कैसे जिन्दा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे आने तक तो जिन्दा हूँ
कितना भी गुस्सा करता हूँ
फिर भी दूर नहीं होता हूँ
रातों में- सपनो में
यादों में जीता जिलाता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
तेरे यादों में जीता रहता हूँ
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