Sunday, October 26, 2014

कई दिन से बदली छाई

कई दिन से यहाँ बदली छाकर 
खुशनुमा माहौल बना रही है 
गीत गुनगुनाने को तुझ पर  
मुझे बार-बार कह रही है 

मैं टाल रहा  था गीत को 
जैसे तुम मुझे टाल रही हो 
गीत कह रही कि तुझे मना लूँ 
सुबह से मुझसे बोल रही है 

वो रूप की शहजादी
तू इतना क्यों इतरा रही है 
रूप की कोई परिभाषा होगी 
तुझसे ही निकल रही है 

कहाँ खोई हो उधेरबुन में 
आजा मेरे पास तुझे हँसा दूँ 
मैं बन गया हूँ तेरे लिए जोकर 
सोचा थोड़ा तुझे मुस्कुरा दूँ 

सीखा मैंने तुझसे ही मुस्कुराना 
क्यों मुस्कराहट भूल गई हो 
किस चिंता में डूबी हो तुम 
शुभ प्रभात भी नहीं की हो 

ज्ञान का दीपक जलाया मैंने 
तेरे मन के अंधकार को देखकर  
कहीं तू भटक ना जाय मुझसे 
प्रकाशित किया हूँ ये सोचकर 

वो चपल चंचल मृगनैनी 
सतरंगी छटा भी झूठी है 
तेरे यादों की रौशनी में 
आज ये मन फिर से नही है 

चल बात कर ले -इकरार कर ले 
मेरा दिल तुझे बुला रहा है 
मेरे  मन का मीत तुझसे 
प्रीत  करने को टकरा रहा है 

ये बदरी  अगर बरस जाती 
सोचता हूँ कैसे तू भींगती 
आसमान से गिरकर बूंदें 
तुझसे मिलने को चिपकती 

हरेक बून्द के उभार में 
तेरा उभार भी प्रकट होता 
जो तू सहेजे हो सालों से 
छूने को जी ललच  उठता 

तुझे छूने को हरवक्त मन 
उठता रहता मचल मचल के 
कैसे तू रुकी हो अबतक मुझे 
छूने नहीं दिया उछल-उछल के 

सोच के मेरा मन कहता है 
आज मना लूँ -तुझे सजा लूँ 
नील गगन में तारों जैसा 
अपने अँखियों में तुझे बसा लूँ 




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