बिछुड़े थे तुम से हम हो विवश
याद कर लो आज का दिवस
टूट गया था- पर था जुटने की आस
आज का दिन है वह काला दिवस
घोर तिमिर मन में छाये
काले काले अँधियारा भरमाये
तुम दिख के क्यों छुप गये
मुझे क्यों अधर में लटकाये
दिल में तुम ही तुम छाये
तुम चाहते क्या - कभी ना बताये
जान भी गए-फिर भी भरमाये
छुप-छुप तुम घुटे- मुझे भी घुटाये
ज्ञान पिपासा बहुत कुछ कहते
जीवन के रंग भी तो चलते
त्याग कर ही दिए-तो किसका क्या
कोई रावण-कंस तो हम नहीं थे बनते
जी-लिया तो किसका जिया
जीते तो हम अपना ही जीवन
मुझे दोष दे केवल-छोड़ दिए मरते
पर घुटता रहा हम-दोनों का जीवन
बिना जाने कारण-ले लिए निर्णय अकेले
अगर जानते होते कारण-नहीं लेते निर्णय अकेले
बहुत ज्ञान है मुझे -बहुत किया जीवन में दमन
दमन का कोई औचित्य नहीं-नहीं रह पाउँगा तेरे बिन अकेले
यह काला दिवस - क्यों बनाया
खूब जानते तुम - खूब सताए तुम
बिन कारण है - यह दिवस
केवल मैं तड़प रहा-और देखते रहते तुम
कितना दिन चल पाउँगा
कितना दिन रह पाउँगा
जीवन बिना इक्ष्छा नहीं चलती
देखते रहना-जल्द ही आँख मूँदूँगा
काला दिवस ना बन जाये काल दिवस
तुझे नहीं लगता देख के द्वापर को
भीष्म की प्रतिज्ञा क्या बेकार ना लगती
वर्तमान हमेशा विकट ही दीखता सभी को
नहीं बनता है तुकांत अब कोई कविता
नहीं भी लिखूंगा-तुझे क्या फर्क पड़ता
लिख भी लूंगा-तुझे क्या लाभ मिलता
कायनात में मिल के देखो-महसूसोगे तो है मिलता
नहीं दूंगा ज्यादा कष्ट तुझे कोई
जैसे रखोगे रह लूंगा जीवन में
आगे बहुत कर्म है जीवन में
जैसे भी चलो-दूर ही सही-पर चलो साथ में
याद कर लो आज का दिवस
टूट गया था- पर था जुटने की आस
आज का दिन है वह काला दिवस
घोर तिमिर मन में छाये
काले काले अँधियारा भरमाये
तुम दिख के क्यों छुप गये
मुझे क्यों अधर में लटकाये
दिल में तुम ही तुम छाये
तुम चाहते क्या - कभी ना बताये
जान भी गए-फिर भी भरमाये
छुप-छुप तुम घुटे- मुझे भी घुटाये
ज्ञान पिपासा बहुत कुछ कहते
जीवन के रंग भी तो चलते
त्याग कर ही दिए-तो किसका क्या
कोई रावण-कंस तो हम नहीं थे बनते
जी-लिया तो किसका जिया
जीते तो हम अपना ही जीवन
मुझे दोष दे केवल-छोड़ दिए मरते
पर घुटता रहा हम-दोनों का जीवन
बिना जाने कारण-ले लिए निर्णय अकेले
अगर जानते होते कारण-नहीं लेते निर्णय अकेले
बहुत ज्ञान है मुझे -बहुत किया जीवन में दमन
दमन का कोई औचित्य नहीं-नहीं रह पाउँगा तेरे बिन अकेले
यह काला दिवस - क्यों बनाया
खूब जानते तुम - खूब सताए तुम
बिन कारण है - यह दिवस
केवल मैं तड़प रहा-और देखते रहते तुम
कितना दिन चल पाउँगा
कितना दिन रह पाउँगा
जीवन बिना इक्ष्छा नहीं चलती
देखते रहना-जल्द ही आँख मूँदूँगा
काला दिवस ना बन जाये काल दिवस
तुझे नहीं लगता देख के द्वापर को
भीष्म की प्रतिज्ञा क्या बेकार ना लगती
वर्तमान हमेशा विकट ही दीखता सभी को
नहीं बनता है तुकांत अब कोई कविता
नहीं भी लिखूंगा-तुझे क्या फर्क पड़ता
लिख भी लूंगा-तुझे क्या लाभ मिलता
कायनात में मिल के देखो-महसूसोगे तो है मिलता
नहीं दूंगा ज्यादा कष्ट तुझे कोई
जैसे रखोगे रह लूंगा जीवन में
आगे बहुत कर्म है जीवन में
जैसे भी चलो-दूर ही सही-पर चलो साथ में



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