Tuesday, October 7, 2014

दिन बीत गया

दिन बीत गया, पर उनकी आवाज़ नहीं आई 
बस भूतों की सायं-सायं सी आवाज़ आई 
क्या करे मनवा - कैसे समझाए उनको 
मन उनमे ही रमता है - क्यों नहीं उन्हें समझ आई 

ठुमुक-ठुमक कर चलती होंगी 

इधर-से-उधर घूमती होंगी 
बिना-बात का बात करती होंगी 
जहाँ करनी है बात-नहीं करेंगी 

क्यों मैं तेरे एक इशारे पर दौड़ पड़ता हूँ 
जबकि तुम चुप होकर मुस्कुराते रहते 
कई बार तेरे चुप्पी से मुँह बना कर लौटा हूँ
टूटकर सचमुच तब शरीर में प्राण नहीं रहते 

एक बार-बस एक बार-कृपया तुम आवाज़ दो 
फिर सारे के सारे कार्य आगे के सफल हो जायेगा 
यह सत्य है कि तुम चहेते हो बहुत सारों के  
क्या तुम अहसान कर रहे-पर हर-बार मुझे ही  तपना पड़ेगा  

प्यार अहसान नहीं-यह तुम भी जानते 
प्यार अहसास है - यह तुम खूब जानते 
एक-दूसरे को इज़्ज़त देना-हम दोनों जानते 
एक दूसरे के लिए जीना-मरना,हम जानते 

यह सहभाग है-दोनों का बराबर का भाग है 
हम दोनों को अहसान नहीं-अहसास चाहिए 
अनवरत प्यार की मीठी-मीठी गुदगुदी चाहिए
धड़कते दिल से प्यार का आदान-प्रदान चाहिए 

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