Friday, October 17, 2014

एक मुलाकात और हमदोनों की बात

तुमसे बात करने की ललक में 
मैं किस-किस से बात कर लेता हूँ 
और तुम समझते तुम्हे छोड़ 
किसी और से बात कर लेता हूँ 

देखता हूँ उन शब्दों को 
जो तुम फटाफट लिखते जाते 
धीरे-धीरे जब लिखावट होता 
कोई और है-मुझे पता लग जाते 

कोई बात नहीं- मृगनैनी !

जितना मिलना है तेरा प्यार 
मुझे उतना ही मिल पायेगा 
ख़ुदा ने जितना बख्शा  है 
उससे ज्यादा थोड़े ही मिल पायेगा

तुम्हे भी पता है - जो हमसे बात कर रहा है 
कि मैं उसे धन नहीं दूंगा 
बस तुमसे बात करने की ललक में
उसका मन रख लेता हूँ और रख लिया करूँगा :)

इधर देखा था-एक नाटक - एक मुलाक़ात 
शाहिर लुधयानवी और अमृता प्रीतम पर 
लौटा था "शाहिर का रूह" प्रीतम से बात करने 
मौत के बाद भी शाहिर-का-तन छोड़ने पर 

देखकर कर कथा- यही लगा 
चाहते तो दोनों थे - पर 
कुछ रोजमर्रे की ज़िन्दगी में 
कुछ देश के हालत में
कुछ दोनों धर्मों के बीच में 
कुछ ग़लतफ़हमी में 
कुछ जरूरत-से-ज्यादा विश्वास में 
कुछ अलग-अलग रहने में 
कुछ दोनों के भिन्न-भिन्न जीविकोपार्जन में 
बहुत कुछ होता चला गया 
और सोचते रहे - वक़्त निकलता चला गया ,

ये जमाना तब भी इन्हें देखा करता था 
शिराज के मरने के बाद भी देखा करता था 
प्रीतम के अंतिम दिन तक देखा करता था 
और आज भी जमाना देखा करता था 

नाटक के हॉल में यही सुनाई दे रहा था 
अगर दोनों मिल गए होते 
तो किसका क्या हो गया होता 
तो किसका घाटा हो गया होता 
तो किसको फायदा हो गया होता 

अगर ना मिल पाये दोनों 
तो किसका क्या हो गया था 
तो किसका घाटा हो गया था  
तो किसको फायदा हो गया था 

=================================================================
शाहिर की ही लिखी हुई - एक गीत 

ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं
------------------------------------------
ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनियाँ
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनियाँ
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनियाँ
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं

हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहो में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनियाँ हैं या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं

जहाँ एक खिलौना हैं, इंसान की हस्ती
ये बस्ती हैं मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से मौत सस्ती 
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं

जवानी भटकती हैं बदकार बन कर
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर
यहाँ प्यार होता हैं व्योपार बनकर
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं

ये दुनियाँ जहाँ आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं हैं
यहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं

जला दो इसे, फूँक डालो ये दुनियाँ
मेरे सामने से हटा लो ये दुनियाँ
तुम्हारी हैं तुम ही संभालो ये दुनियाँ
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं

No comments:

Post a Comment