एक ग़ज़ल
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देखा तुझे यादों में, खयालों में , सपनों में
तेरे नशीले रूप को
भरकाते हुए योवन में, आँखों में, दुपहरी में
छलक जाते थे जाम तेरे नैनो से
पीकर मदहोश हो जाता था तेरे नैनो से
तेरे लब से रस जो निकल पड़ते थे
पी लेता था उन रसों को अपने नैनों से
तेरे मद्धम चाल की वो ठक-ठक आवाज़
जगा देती थी मेरे सोये अरमानों को
कुहुक के रह जाता था तुझे छूने से
कैसे भूलूँ मैं उन यादों को, तेरे इरादों को
शेर अर्ज़ है ...
ख़ुदा जो बक्शा है तुझमे नज़ाकत
उससे जयादा कहीं हैं तुझमे नफासत
कहूँ मैं ख़ुदा से कि दे दे देखने की ताकत
और देखता रहूँ यहीं दूर से तेरी अदालत
कैसे कैसे दिन बीते, कैसे कैसे रात
पर ख़त्म ना हुआ तेरे गुस्सों का अम्बार
कैसे कहूँ - किससे कहूँ - कोई नहीं सुनने वाला
एक तू ही थे मृगनैनी, थे मेरे दिल का यार
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देखा तुझे यादों में, खयालों में , सपनों में
तेरे नशीले रूप को
भरकाते हुए योवन में, आँखों में, दुपहरी में
छलक जाते थे जाम तेरे नैनो से
पीकर मदहोश हो जाता था तेरे नैनो से
तेरे लब से रस जो निकल पड़ते थे
पी लेता था उन रसों को अपने नैनों से
तेरे मद्धम चाल की वो ठक-ठक आवाज़
जगा देती थी मेरे सोये अरमानों को
कुहुक के रह जाता था तुझे छूने से
कैसे भूलूँ मैं उन यादों को, तेरे इरादों को
शेर अर्ज़ है ...
ख़ुदा जो बक्शा है तुझमे नज़ाकत
उससे जयादा कहीं हैं तुझमे नफासत
कहूँ मैं ख़ुदा से कि दे दे देखने की ताकत
और देखता रहूँ यहीं दूर से तेरी अदालत
कैसे कैसे दिन बीते, कैसे कैसे रात
पर ख़त्म ना हुआ तेरे गुस्सों का अम्बार
कैसे कहूँ - किससे कहूँ - कोई नहीं सुनने वाला
एक तू ही थे मृगनैनी, थे मेरे दिल का यार
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