Thursday, October 9, 2014

शीत के प्रथम प्रहर

जब तुम मुस्कुराती हो 
चाँद सी शर्माती हो 
चुपके से मेरे नैनों में 
दिल में उतर जाती हो 

चैन-वैन सब लूट के तू  
मन ही मन समाती हो
जब-जब पूछूं तेरी बातें  
दिल में कूक जगाती हो 

जैसे ही पवन का झौंका
छूता है मेरे तन को  
याद आते है तेरा तन 
कैसे छुआ होगा तुझको  

उडाता है मेरे बालों को 
याद आते तेरे रेशमी बाल 
कैसे उड़ते थे तेरी जुल्फें
जब तू रखते थे खुले बाल 

तेरी चाल-ढाल सब अनोखी 
उस अदा पे निकले-उफ़ 
खुली दुपहरी में भी 
छा जाय अँधेरा घुफ़  

छूने को बदन तेरा 
हाथ अपने से बहके 
ऐसा लगे-छूते तू भी गोरी 
मन-ही-मन चहके 

ठण्ड की पहली प्रहर
शीत जगाये तन में 
अगन लगाये तन में गोरी 
आलिंगन की आस में 

लाल-लाल रतनार सा 
गोरी तू छैल-छबीली 
किस दुनिया में उलझे तू 
आ चल मिले हमजोली 



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