तुझे जो देखा एक नए मुखड़े में
एक गाया ग़ज़ल बदल जाता हैं
देख के तेरा अंग-अंग गोरा
मृगनयनी आँखों में खो जाता हैं ...
चांदी जैसा रंग है तेरा, ये काले-काले बाल
एक तू ही मृगनैनी है गोरी,सारा जग कंगाल...
अगर बंदिश नहीं होती
दुनिया की दीवारो का
बदल देता यह पूरी ग़ज़ल
ले के नाम मृगनैनी का
पूछ लो तुम किसी से भी
कितनी तुम हसीन-जहीन हो
कभी मृगनैनी- कभी हंसिनी
कभी सुन्दर सी नाज़नीन हो
तेरी मृगनयनी आँखों का नूर
देता मुझे एक सात्विक असर
भले दुनिया तुझे कुछ भी कहे
मुझे दीखता पार्वती की नज़र
कितना भाग्यवान होगा वो
जो पायेगा तुझे पाकर
मुझे बना के एक मुसाफिर
जिसे दिया नहीं कभी एक नज़र
देखता रहा मै दूर से ही
कभी पूछ भी लेते,देखते क्यों
कहता तुझ से-हे मृगनैनी
तू कहा थे अबतक,जाने नहीं क्यों
चल आजा उड़ चलते हैं
नीलगगन में सितारों साथ
सही आत्मा-का-आत्मा से
मिलन हो जाता परमात्मा साथ
पूछा भी नहीं तुझसे
कि तुझे कैसा लगेगा चाहने से
ज्ञान नहीं था इस राह का
तभी तो चाहने लगा अकेले से
मै हुँ इस क़ाबिल या नहीं भी
यह कभी नहीं सोच पाता
नहीं याद रहा दुनिया-के-नियम
तुझे देखते ही सबकुछ भूल जाता
क्यों इतने दुबले हो गए हो
खाना-पीना भी खाया करो
इसी तरह रहो मुस्कुराते
चांदनी की तरह दमकती रहो
इक्छा तो बहुत थी बात करने की
पर तुमने बात नहीं किया
क्या समझाऊँ अपने को, मै तो दूर हुँ
दोष न देना कि मैंने पहल नहीं किया
तेरे मामले में, मै नहीं सोच पाता
ना दुनिया की,ना उम्र की,ना समय की
अब तू रखो या फेक दो, हे मृगनयनी
नहीं पता मुझे इस नस्सवर संसार की
एक गाया ग़ज़ल बदल जाता हैं
देख के तेरा अंग-अंग गोरा
मृगनयनी आँखों में खो जाता हैं ...
एक तू ही मृगनैनी है गोरी,सारा जग कंगाल...
अगर बंदिश नहीं होती
दुनिया की दीवारो का
बदल देता यह पूरी ग़ज़ल
ले के नाम मृगनैनी का
पूछ लो तुम किसी से भी
कितनी तुम हसीन-जहीन हो
कभी मृगनैनी- कभी हंसिनी
कभी सुन्दर सी नाज़नीन हो
तेरी मृगनयनी आँखों का नूर
देता मुझे एक सात्विक असर
भले दुनिया तुझे कुछ भी कहे
मुझे दीखता पार्वती की नज़र
कितना भाग्यवान होगा वो
जो पायेगा तुझे पाकर
मुझे बना के एक मुसाफिर
जिसे दिया नहीं कभी एक नज़र
देखता रहा मै दूर से ही
कभी पूछ भी लेते,देखते क्यों
कहता तुझ से-हे मृगनैनी
तू कहा थे अबतक,जाने नहीं क्यों
चल आजा उड़ चलते हैं
नीलगगन में सितारों साथ
सही आत्मा-का-आत्मा से
मिलन हो जाता परमात्मा साथ
पूछा भी नहीं तुझसे
कि तुझे कैसा लगेगा चाहने से
ज्ञान नहीं था इस राह का
तभी तो चाहने लगा अकेले से
मै हुँ इस क़ाबिल या नहीं भी
यह कभी नहीं सोच पाता
नहीं याद रहा दुनिया-के-नियम
तुझे देखते ही सबकुछ भूल जाता
क्यों इतने दुबले हो गए हो
खाना-पीना भी खाया करो
इसी तरह रहो मुस्कुराते
चांदनी की तरह दमकती रहो
इक्छा तो बहुत थी बात करने की
पर तुमने बात नहीं किया
क्या समझाऊँ अपने को, मै तो दूर हुँ
दोष न देना कि मैंने पहल नहीं किया
तेरे मामले में, मै नहीं सोच पाता
ना दुनिया की,ना उम्र की,ना समय की
अब तू रखो या फेक दो, हे मृगनयनी
नहीं पता मुझे इस नस्सवर संसार की

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