Thursday, July 10, 2014

दिल में ये आवाज़ आया

आस विस्वास त्याग दिया 
किसने ये आवाज़ दिया 
दौड़ो दौड़ो प्रियतम मेरे 
दिल में ये आवाज़ आया 

आओ आओ प्रियतम मेरे 
तुझ बिन सागर रीता है 
नदी जो चली थी मिलने 
क्यों ऐसे घबराता है 

कल के कविता में जुमला था दुःख का 
अब दुःख नहीं है उस भूले हुए पल का 
गुस्ताखी तो मैंने ही की थी तुझसे 
जो बिना पूछे जताया प्यार का 

उसकी सजा तो मिली हमें, 
पर अब भी कुछ है बाकी
वो भी दे दो अभी अभी
उफ़ न करूँगा, एक भी सांस की 

मुझसे ज्यादा तो तुम होगे झेले 
कहकहे लगे होंगे जमकर के 
किस-किस के इरादे कैसे हुए होंगे 
कड़वी घूंट तो तुम  पिए समय के 

सचमुच ये सोचकर 
हुआ था मैं बहुत परेशान 
ऐसे निकल गया था मैं भी 
जैसे कभी नहीं थी पहचान 

नहीं कहूँगा माफ़ करना 
दे देना जो भी हो सजा 
तेरे सजा को झेलने में 
मुझे मिलेगा खूब मज़ा :)

कल का तेरा विचार देख के 
रात भर मन उद्विग्न रहा 
नींद भी नहीं आई मुझे 
अँखियाँ भी बेचैन रहा 

चेहरे-किताब का अर्धनारीश्वर 
बहुत मन में है भाया
कहने को तो बहुत कुछ है 
पर पता नहीं क्यों अँधेरा छाया

कृपया ये खालीपन दिल से हटाओ 
और दिखाओ अब चाँद सा मुखड़ा 
जिसे देख तुमसे बात कर सके
मैं-रूप का यह अदद तेरा टुकड़ा 




No comments:

Post a Comment