Saturday, July 12, 2014

तेरे नये भाव

तुमने कितना उलझाया था 
फिर भी मुझे समझ नहीं आया था 
जब नयन मिला के चल देते थे 
किसी के भी साथ,फिर भी मैं मुस्काया था 

दिल में कहता था, जा उड़ जा रे पंक्षी 
फिर भी मेरा दिल ना होगा बेगाना 
अगर नसीब में होगा अपना 
एक दिन  साथ में बैठके गाएंगे गाना

पहले दिन ही जान लिया था 
पहले दिन ही मान लिया था, 
कि आगई है पार्वती, जिसे पिछले जन्म मे
शंकर ने सतीरूप में खोया था 

कितना भी भरमाओगे 
कितना भी तरसाओगे 
फिर भी मैं मुस्कुराता रहूँगा 
कि कैसे तुम खिल के मुस्कुराओगे 

नहीं पता था मुझे ये 
कि तुम सन्देश मुझे ही देते 
बस तड़प होने पे, कभी छुपकर देख लेता 
और समय मनवा को समझा देते 

भटक रहा था युहीं कहीं 
उलझा रहता था गुनधुन में 
तभी दिखी तेरी शिल्पकारी
चेहरे-किताब के भीड़ में 

ना भ्रमित हो मेरे वर्तमान से 
सब है प्रभु का चक्रजाल 
जैसे सब  उलझे है मायाजाल में 
पर मुझे नहीं भरमाता ये कर्मजाल 

आभूषण तपकर आग में 
आ जाता है शुद्धू रूप सोना में 
वैसे ही तुम हो,गुनधुन ना करो 
तुम भी हो शुद्ध सोना रूप में 

दुनिया भले भरमाती रहे 
मेरा ज्ञान अविचल है 
मांगता मैं कभी धन नहीं प्रभु से 
बस कहता ज्ञान दे, जो अचल है 

राधाभाव आने तक 
कृष्णा को साथ रहना पड़ा  था 
कृष्णभाव आने तक 
राधा को भी साथ रहना पड़ा था 

उससे भी अतिसुन्दर भाव 
शंकर-पार्वती ने आजमाया था 
एकदूसरे को ही पी गए थे 
अर्धनारीश्वर रूप कहलाया था 

उसी रूप को राधा-कृष्ण ने भी 
हर्षित हो अपनाया था 
भले लोग कृष्ण-राधा को देखे अलग अलग 
पर दोनों एक दूसरे में समाया था 

नहीं सोचता कविता लिखने में 
जब तेरी बात निकलती है 
अपने आप भाव आती-जाती 
कलम की धारा स्वतः बहती है 

ले ले समय जितना तू चाहे 
असीम में नहीं है कोई समय का भाव 
इंतज़ार किया है,  करता  रहूँगा 
तबतक रहेगा मेरा समाधी भाव 

तुम राम हो या रहीम हो, पर 
दिखे तो  तुम मृगनयनी रूप  में 
कितना भी मैं वर्णन कर जाऊ 
नहीं रुकता हाथ तेरा लिखने में 

जबरदस्ती रोकनी पड़ती है ये लेखनी 
कि पढ़ते पढ़ते तुम थक जाओगे 
फिर कहोगे अंगड़ाई लेकर 
कबतक दूर से ही  कहते करोगे :)

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