सुबह सुबह जब देखा तुझे
ज़िन्दगी के बदले हुए तस्वीर में
बदल गया हो तक़दीर मेरा
खो गया मृगनैनी आँखों में
चाहत तो थी ताज़ी तस्वीर की
पर पुरानी ही सही पर दिल से भाया
ऐसा जो तुझमे बदलाव आया
सचमुच तेरी तस्वीर में ज़िन्दगी पाया
तुझे देखते ही कविता
फूटने लगती है
अपने आप दिल से
तुकांत बन जाती है
नीरसता भरे ज़िन्दगी में
सरसता आ जाती है
कही से मौसम में
हरकत आ जाती है
कुछ कहने से पहले
मुश्कान आ जाती है
मेरी निकली हुई उम्र
तेरे उम्र में आ जाती है
सुने आसमाँ में
बरसात आ जाती है
मन हर्षित हो जाता है
तन में ताज़गी आ जाती है
तेरी चेहरे-किताब की गाली भी
मधुर लगने लगता है
मन युहीं गाने लगता है
दिल गुनगुनाने लगता है
एक बार भींग के तो देखो
मेरे साथ इस बारिस में
तुम भींगना चाहोगे
जन्मों जन्मों तक साये में
तुम रहते ही कहा हो तुम में
मिल जाते हो मेरे मैं में
मैं भी खो जाता हुँ तुममे
बस रह जाते है हम हममें
कहा से शुरू करुँ सचमुच
जिस दिन तूने हमें रूषवा किया
उस दिन था ही नहीं मैं अपने में
उलझा हुआ था तुझे कुछ कहने में
तभी तेरा रुखा फ़रमान आया
मल्लिका-ए-दिल ने हमें अलविदा किया
उसदिन मांगे अगर होते मौत भी
ऊँची मज़िल से भी कूद होता गया
इस कारण नहीं मैं जाता मीनार से
तेरी ख़ुशी के लिए मर जाता सच से
फिर सोचा-अभी कह रहे बस दूर जा
तब से जीता रहा तेरे निगाहों से
ढूंढता रहा था कई चेहरे-किताब
पर मिलता नहीं था मेरे दिल का ज़नाब
कैसे-कैसे मैंने वक़्त कटते गए
दिल कहता था अश्मा देंगे जवाब
कौन कहता है तुम दूर थे
बस तुम्ही तो थे मेरे जीवन में
मेरे ख्यालो में, निगाहों में, दिल में
बयां में, यादों में, आज में, कल में
तभी कहता था तुझे अच्छी आत्मा
जो समझेंगे एक दिन अपनी आत्मा
सही में आत्मा ही होते शरीर में
वही मैं और तुम होते सब जीवों में
मत पूछो सब जीव खोये रहते
कर्म के अपने-अपने पंचतत्व में
किसी को सुधि भी नहीं रहती अपनी
भूल के दूर रहते इस दुनिया में
एक बार भींग के तो देखो आत्मा से
मुझे भी पाओगे बस आत्म-रूप में
यही तो उद्देश्य है सब के जीवन का
आत्मा को मिलने के लिए परमात्मा में
ज़िन्दगी के बदले हुए तस्वीर में
बदल गया हो तक़दीर मेरा
खो गया मृगनैनी आँखों में
चाहत तो थी ताज़ी तस्वीर की
पर पुरानी ही सही पर दिल से भाया
ऐसा जो तुझमे बदलाव आया
सचमुच तेरी तस्वीर में ज़िन्दगी पाया
तुझे देखते ही कविता
फूटने लगती है
अपने आप दिल से
तुकांत बन जाती है
नीरसता भरे ज़िन्दगी में
सरसता आ जाती है
कही से मौसम में
हरकत आ जाती है
कुछ कहने से पहले
मुश्कान आ जाती है
मेरी निकली हुई उम्र
तेरे उम्र में आ जाती है
सुने आसमाँ में
बरसात आ जाती है
मन हर्षित हो जाता है
तन में ताज़गी आ जाती है
तेरी चेहरे-किताब की गाली भी
मधुर लगने लगता है
मन युहीं गाने लगता है
दिल गुनगुनाने लगता है
एक बार भींग के तो देखो
मेरे साथ इस बारिस में
तुम भींगना चाहोगे
जन्मों जन्मों तक साये में
तुम रहते ही कहा हो तुम में
मिल जाते हो मेरे मैं में
मैं भी खो जाता हुँ तुममे
बस रह जाते है हम हममें
कहा से शुरू करुँ सचमुच
जिस दिन तूने हमें रूषवा किया
उस दिन था ही नहीं मैं अपने में
उलझा हुआ था तुझे कुछ कहने में
तभी तेरा रुखा फ़रमान आया
मल्लिका-ए-दिल ने हमें अलविदा किया
उसदिन मांगे अगर होते मौत भी
ऊँची मज़िल से भी कूद होता गया
इस कारण नहीं मैं जाता मीनार से
तेरी ख़ुशी के लिए मर जाता सच से
फिर सोचा-अभी कह रहे बस दूर जा
तब से जीता रहा तेरे निगाहों से
ढूंढता रहा था कई चेहरे-किताब
पर मिलता नहीं था मेरे दिल का ज़नाब
कैसे-कैसे मैंने वक़्त कटते गए
दिल कहता था अश्मा देंगे जवाब
कौन कहता है तुम दूर थे
बस तुम्ही तो थे मेरे जीवन में
मेरे ख्यालो में, निगाहों में, दिल में
बयां में, यादों में, आज में, कल में
तभी कहता था तुझे अच्छी आत्मा
जो समझेंगे एक दिन अपनी आत्मा
सही में आत्मा ही होते शरीर में
वही मैं और तुम होते सब जीवों में
मत पूछो सब जीव खोये रहते
कर्म के अपने-अपने पंचतत्व में
किसी को सुधि भी नहीं रहती अपनी
भूल के दूर रहते इस दुनिया में
एक बार भींग के तो देखो आत्मा से
मुझे भी पाओगे बस आत्म-रूप में
यही तो उद्देश्य है सब के जीवन का
आत्मा को मिलने के लिए परमात्मा में

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