Sunday, July 13, 2014

जा सिमरन जा

कैसे दूर जाने दूँ, मृगनयनी
कितनी बार हूँ मैं बोला, 
जब तेरी याद आती है 
मेरे रोम-रोम में खिलती है

हर्षित मन हो जाता है

सारा उद्विगन्ता छट जाता है 
कोई कस्ट नहीं रहता है
सदा मन मुस्काता है

कैसे पता नहीं तुझे 

तू ही मेरी मुस्कराहट रहे 
और कहती दूर भी हो जा
फिर भी मन मुस्कुरता रहे 

नहीं हो पायेगा मुझसे

अब दर्द नहीं झेल पाउँगा 
जा उड़ जा पवन में, वो बंसती 
तेरा सावन नहीं बर्बाद करूँगा

मैं भी भूल गया था स्वार्थ में

तेरा भी अरमान तो कुछ होगा
माना की तू नहीं है मेरी, पर 
कोई तो तेरा LUCKY साजन होगा

पूछा था किसी ने तेरे बारे में 

कैसा उससे जोड़ी रहेगा 
बोल दिया था मैं - सचमुच में 
जो होगा,भाग्यवान ही होगा 

ज्ञान की भाषा मुझे मत सीखा

ज्ञान ही ज्ञान मुझमे भड़ा है
बस तेरे सामने, वो  मृगनयनी
अपनेआप फीका पड़ जाता है 

जैसे ही तेरी चर्चा चलती है 

ज्ञान ही  मुझसे कहती है 
मत ज्ञान लगा इस बसंती में
कुछ तो झुक,ये अपनी पार्वती है

ज्ञान आगे कहती मुझसे 

वैसे भी तू बहुत ज्ञान लगाया 
एकांत में रह, कितने भोगों को तुमने
अपने से  विरक्त और दूर किया 

एक पल तो जी ले, मुर्दे 

देख कैसे वह हंसती है 
उसकी खिलखिलाहट में कैसे
मौषम में बहार आजाती है

जा सिमरन जा तू अब 

जी ले जिसके साथ तू चाहे 
तेरा भी मन बींधता होगा 
भड़ती होगी तू भी आहे 

नहीं लेना मुझे वो आहे 

जा दे दे तू जिसके लिए तड़पती
नहीं कहूँगा, तुझे मृगनैनी 
जिससे तुझे है बहुत खटकती 

जिया ने अच्छा किया मर के 

कोई अज्ञानी नहीं झेल पायेगा 
पर मैं जानता आत्मा- परमात्मा को
तुझसे बलात नहीं,पर सह जायेगा 

एक बार लिखा था मैं 

औरत होती नदी की तरह 
पास बुला लेती जीवन को 
कलकल बहती मधुर तरह 

नदी के एक और गुण है 

जबतक पानी रहती, बस बहती 
मैंने भी नदी से सिख लिया, 
जी लूंगा कैसे भी, जैसे नदी सहती 

जा सिमरन जा, तू 

जी ले तू अपने पिया के संग 
नहीं झाकूँगा तेरे किताबो पे 
जहाँ कुछ भी नहीं है मेरा रंग 

तेरे भी कुछ अरमान होंगे 

तुझे भी तो है फुदकना, उड़ जा 
पिली नीली हरी बसंती की तरह
जा तू उड़ जा, जा सिमरन जा 

हरवक्त तेरी कोशिश थी तुझे 

मुझसे दूर जाने की,पर दूर होके भी, 
तुझे नहीं कर पाया दूर मुझसे
जा सिमरन जा, जी ले तू अभी 



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